अक्सर हम प्राइवेटाइजेशन को तिरछी निगाहों से देखते हैं, कई बार लगता है कि आखिर सरकार खुद क्यों नहीं घाटे वाली सरकारी कंपनियों को बेहतर तरीके से चला पाती, आखिर सरकार के पास किस चीज की कमी है, पैसा, संसाधन, पावर सबकुछ तो है। बात सुनने में तो काफी सरल और सीधी लगती है, लेकिन उतनी है नहीं। सरकार सिर्फ पैसे झोंककर बैठ नहीं सकती। किसी भी कंपनी को चलाने के लिए कुशल लोगों की जरूरत होती है, जो उस सेक्टर के माहिर होते हैं। जिन्हें ये पता होता है कि गिरे को उठाना कैसे है।
अगर बीमार है तो उसे कड़वी दवा तो लेनी होगी, यही मान लीजिए कि वो कड़वी दवा ही प्राइवेटाइजेशन है। इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आपको इसके कई सफल उदाहरण मिल जाएंगे। 1990 के दशक में देश की अर्थव्यवस्था नई करवट ले रही थी। तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई में देश की अर्थव्यवस्था ने दुनिया से मुकाबला करने के लिए पांव बाहर निकालना शुरू किया था। कई आर्थिक सुधारों को लागू किया गया। जिसने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) के एकाधिकार को खत्म होने का संकेत दिया।
HZL Divestment (2002)
इस पृष्ठभूमि में हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) का निजीकरण एक सफल उदाहरण बन गया। 1990 के दशक के अंत में, हिंदुस्तान जिंक की देश में जिंक प्रोडक्शन पर मोनोपॉली थी। 55-60% मार्केट पर इसका कब्जा था। कंपनी की प्रॉफिट ग्रोथ भी थी, लेकिन घटते टैरिफ और सस्ते इंपोर्ट मार्जिन के लिए खतरा बन रहे थे। साथ ही, उत्पादन क्षमता सीमित थी, जो कि महज 1 लाख टन प्रति वर्ष थी। सरकार को डर था कि अगर बड़े स्तर पर खनन और उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ाई गई, तो कंपनी आगे मुकाबला नहीं कर पाएगी। सरकार के पास टेक्नोलॉजी, ऊंची स्किल और प्रोफेशनल मैनेजमेंट के बिना इस स्थिति से बहुत बड़ा बदलाव लाना मुश्किल था।
इसलिए उस समय की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने मार्च 2002 में कंपनी में अपनी 26% कंट्रोलिंग हिस्सेदारी अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाली स्टर्लाइट इंडस्ट्रीज को 445 करोड़ रुपये में बेच दी। ये डील 40.5 रुपये प्रति शेयर के भाव पर हुई थी। इसके बाद कॉल ऑप्शन के हिस्से के रूप में, सरकार ने नवंबर 2003 में अपनी अतिरिक्त 19% हिस्सेदारी 324 करोड़ रुपये में बेची. यानी कुल करीब 769 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया।
वेदांता को बेचे जाने से पहले हिंदुस्तान जिंक का मार्केट कैप सिर्फ 1,500 करोड़ रुपये के करीब था, जबकि आज ये 3 लाख करोड़ रुपये की वैल्युएशन वाली कंपनी बन चुकी है। यानी 445 करोड़ रुपये में खरीदकर अनिल अग्रवाल अब 3 लाख करोड़ रुपये की वैल्युएशन वाली कंपनी के मालिक हैं। यानी विनिवेश के बाद से इसकी वैल्यूएशन 600 गुना बढ़ चुकी है। उत्पादन क्षमता जो कि 1 लाख टन सालाना थी, अब 12-13 लाख टन सालाना हो चुकी है।
अभी इन्होंने OFS के जरिए 3.35 करोड़ शेयर या 0.79% इक्विटी बेचने का ऐलान किया है, साथ ही 3.35 करोड़ शेयर ग्रीन शू ऑप्शन के जरिए भी बेचे जाएंगे। यानी OFS का कुल साइज करीब 1.6% है। इससे कंपनी को करीब 45,000-46,000 करोड़ रुपये मिलेंगे। रिटेल निवेशकों के लिए ये आज यानी 29 जनवरी, 2026 को ओपन है।
BALCO Divestment (2001)
भारत एल्युमिनियम कंपनी (BALCO) भारत का पहला इंटीग्रेटेड एल्युमिनियम उत्पादक PSU था, जिसकी स्थापना 1965 में हुई थी। 1990-2000 के दौर में प्रतिस्पर्धा का दबाव, लागत और टेक्नोलॉजी की कमी के कारण BALCO के प्रदर्शन को बढ़ाना सरकार के लिए कठिन हो रहा था। उस समय इसकी उत्पादन क्षमता करीब 1 लाख टन सालाना थी, लेकिन प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए विस्तार की जरूरत थी।
इसलिए सरकार ने इसे निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया। BALCO का विनिवेश भारत के प्रमुख स्ट्रैटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट मामलों में से एक है, जो 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान हुआ। यह Hindustan Zinc की तरह ही Vedanta Group को बेचा गया था, लेकिन इसमें काफी विवाद और कानूनी चुनौतियां रहीं। सरकार ने 51% हिस्सेदारी मैनेजमेंट कंट्रोल सहित अनिल अग्रवाल की कंपनी स्टर्लाइट इंडस्ट्रीज को 551.5 करोड़ रुपये में बेचा। बाकी 49% हिस्सेदारी आज भी सरकार के पास है।
प्राइवेटाइजेशन के बाद कंपनी ने इसका विस्तार किया, प्रोडक्शन बढ़ाया। भारत के एल्युमिनियम सेक्टर में अब इसका मजबूत योगदान है। अब इसकी उत्पादन क्षमता 1 लाख टन से बढ़कर करीब 6 लाख टन सालाना हो चुकी है। कंपनी अब Vedanta Aluminium का हिस्सा है। भारत की कुल एल्युमिनियम कैपेसिटी का 20% BALCO से आता है। अब चूंकि BALCO लिस्टेड कंपनी नहीं है, बल्कि वेदांता की सब्सिडियरी है, इसलिए अलग मार्केट कैप नहीं है। लेकिन वेदांता के एल्युमिनियम बिजनेस की वैल्यू बहुत ज्यादा है। वेदांता की फिलहाल मार्केट कैप 2.95 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें BALCO का भी बड़ा योगदान है।
जहां तक सरकार की बात है, उसकी 49% हिस्सेदारी कै वैल्यू भी करीब 30,000-40,000 करोड़ से ज्यादा की आंकी जा रही है। सरकार भी इसमें अपनी हिस्सेदारी को बेचने की योजना बीते 2 दशक से बना रही है, लेकिन विवादों की वजह से अबतक ऐसा नहीं कर पाई है।
VSNL Divestment (2002)
1990 के दशक में अंतरराष्ट्रीय टेलीफोन सेवाएं मुहैया कराने में टेलीकॉम सेक्टर पर विदेश संचार निगम लिमिटेड (VSNL) का एकाधिकार था। भारत की सीमाओं से इनकमिंग-आउटगोइंग हर 400 करोड़ मिनट की कॉल्स पर किराया मिलता था। VSNL के अलावा कोई दूसरी कंपनी थी ही नहीं, ये सारा पैसा कंपनी के पास इकट्ठा होता रहा। मार्च 2001 तक इसके पास 4,800 करोड़ रुपये का कैश भंडार था। मगर, वक्त के साथ कंपनी कदम नहीं मिला सकती थी। सरकार ने अप्रैल 2002 से निजी कंपनियों को भी इसमें अंतरराष्ट्रीय टेलीफोन सेवाएं मुहैया कराने की इजाजत देने का फैसला किया। सरकार ने निजी खिलाड़ियों के साथ मुकाबले में उतरने के बजाय VSNL में अपनी कंट्रोलिंग हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया।
अब सवाल ये था कि एक ऐसी कंपनी जिसकी मोनोपॉली थी, मगर ये ताज उसके सिर से उतरने वाला है, ऐसी कंपनी के लिए कौन दांव लगाएगा। मगर, टाटा ग्रुप ने आगे बढ़कर बोली लगाई। फरवरी 2002 में, टाटा ग्रुप ने 1,439 करोड़ रुपये में कंपनी में 25% हिस्सेदारी हासिल की, जबकि सरकार ने 26% हिस्सेदारी अपने पास रखी। इसके बाद, टाटा ग्रुप ने VSNL में अतिरिक्त 20% हिस्सेदारी के लिए दूसरे माइनॉरिटी शेयरधारकों के लिए कैश-टेंडर ऑफर जारी किया। साथ ही, VSNL की करीब 770 एकड़ अतिरिक्त भूमि को अलग कर सरकार के पास रख लिया गया। यह अतिरिक्त-भूमि कंपनी, जिसका नाम Hemisphere Properties है एक लिस्टेड कंपनी है। VSNL की हिस्सेदारी बेचकर सरकार को 3,689 करोड़ रुपये मिले।
VSNL का नाम बदलकर टाटा कम्यूनिकेशंस हुआ। कंपनी ने वक्त के साथ अपने बिजनेस को भी बदला। कंपनी अब केवल टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर नहीं है बल्कि डिजिटल नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर सॉल्यूशंस में एक ग्लोबल प्लेयर है। सरकार 2021 में अपनी बची 26.12% हिस्सेदारी भी बेच चुकी है, जिससे सरकार का टाटा कम्यूनिकेशंस से करीब करीब पूरी तरह से बाहर हो चुकी है। VSNL की वैल्युएशन विनिवेश से पहले 4,400 करोड़ रुपये आस-पास थी, जो कि अब 44,000 करोड़ रुपये के करीब है।
हालांकि VSNL का विनिवेश टाटा ग्रुप के लिए एक चुनौती ही रहा। शुरुआती 8-10 साल यानी 2002-2012 के दौरान कंपनी की रेवेन्यू ग्रोथ धीमी रही, और मार्च 2001 से मार्च 2020 तक आय मात्र 2.3 गुना बढ़ी, जबकि टेलीकॉम सेक्टर में तेज बदलाव और गलाकाट कंपटीशन ने चुनौतियां पैदा कीं। अब जो टाटा कम्यूनिकेशंस है, वो वक्त और कई थपेड़े झेलने के बाद है। इसलिए ये बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि विनिवेश से वैल्यू अनलॉकिंग और वेल्थ क्रिएशन आसान नहीं होती है।
IPCL Divestment (2002)
इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IPCL) भारत की एक लीडिंग पेट्रोकेमिकल्स कंपनी थी, जिसकी शुरुआत 1969 में भारत सरकार ने की थी। इसका मकसद था पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री को विकसित करना और देश में पॉलीमर, कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करना। कंपनी के प्रोडक्ट्स में पॉलीथीलीन (PE), पॉलीप्रॉपलीन (PP), PVC, सॉल्वेंट्स, सर्फैक्टेंट्स, औद्योगिक केमिकल्स शामिल थे। ये रिलायंस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पेट्रोकेमिकल कंपनी थी। मगर सरकार IPCL को ज्यादा प्रतिस्पर्धी और आधुनिक बनाने के लिए निजी भागीदार चाहती थी।
IPCL का विनिवेश भारत के प्रमुख रणनीतिक विनिवेशों में से एक है, जो 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान हुआ। यह रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) को बेचा गया था। सरकार ने अपनी 26% हिस्सेदारी करीब 1,490 करोड़ रुपये में बेची थी, यानी 231 रुपये प्रति शेयर के भाव पर। इसके बाद रिलायंस पेट्रोइन्वेस्टमेंट (RPIL) ने SEBI के टेकओवर नियमों के तहत ओपन ऑफ़र से अतिरिक्त 20% शेयर खरीदे और कुल 46% हिस्सेदारी हासिल की। रिलायंस ने IPCL में बढ़ती हिस्सेदारी के साथ 2007 में IPCL को अपने साथ मर्ज कर दिया। IPCL के शेयरधारकों को RIL के शेयरों के बदले में 1:5 अनुपात से शेयर दिए गए। रिलायंस के नियंत्रण के बाद IPCL ने ऑपरेशनल दक्षता, उत्पादन क्षमता और ग्लोबल मार्केट पहुंच को बेहतर किया।
Maruti Divestment (2003-2007)
फरवरी 1981 में भारत सरकार ने मारुति उद्योग लिमिटेड की स्थापना की, जो कि एक पूरी तरह से सरकारी कंपनी थी। 1982 में जापान की सुजुकी मोटर कॉरपोरेशन के साथ जॉइंट वेंचर (JV) एग्रीमेंट किया गया, जिसके तहत सुजुकी ने कंपनी में 26% हिस्सेदारी ली, सरकार के पास 74% हिस्सा था। कंपनी की कुल वैल्युएशन उस समय 77 करोड़ रुपये थी। सरकार का मकसद था कि लोगों के लिए एक किफायती छोटी कार लेकर आए। 1983 में Maruti 800 लॉन्च हुई। भारत की पहली मॉडर्न छोटी कार, जो कार मार्केट को क्रांति लेकर लाई।
मगर, वक्त के साथ दिक्कतें शुरू हुईं। बोर्ड और मैनेजमेंट में सरकारी दखल काफी ज्यादा था। फैसले लेने में काफी वक्त लगता था। टेक्नोलॉजी अपग्रेड पर भी सहमति नहीं बन पाती। सुजुकी और सरकार के बीच में टकराव होने लगा। सुजुकी चाहती था कि उसकी हिस्सेदारी ज्यादा हो और ऑपरेशन कंट्रोल भी उसके हाथ में रहे, लेकिन सरकार ऐसा नहीं चाहती थी। ये विवाद इतना बढ़ा कि कंपनी की ग्रोथ ठहरने लगी। Hyundai, Tata, GM, Ford जैसी कंपनियों की एंट्री ने मुश्किलें और बढ़ा दी थीं।
सरकार को एक बात समझ आई कि ऑटो इंडस्ट्री अब स्ट्रैटेजिक सेक्टर नहीं रहा, सरकार का काम कार चलाना नहीं, बल्कि नीतियां बनाना है। सुजुकी के पास ज्यादा अच्छी टेक्नोलॉजी है, ग्लोबल अनुभव है, लॉन्ग टर्म कमिटमेंट है। इसलिए स्ट्रैटेजिक विनिवेश का रास्ता चुना गया। सरकार ने पहले चरण में अपनी 49.7% हिस्सेदारी में से 4.20% हिस्सेदारी को सुजुकी के पक्ष में 400 करोड़ रुपये के राइट्स इश्यू के जरिए कम किया। सुजुकी ने सरकार को Rs 1,000 करोड़ कंट्रोल प्रीमियम के रूप में भुगतान किया और अपनी हिस्सेदारी को बढ़ाकर 54.20% कर लिया। 2007 में सरकार अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच चुकी है।
आज मारुति भारत की सबसे बड़ी कार कंपनी है। ये विनिवेश इतिहास के सफल विनिवेशों में सबसे ऊपर गिना जाता है। सरकार को विनिवेश से मोटी रकम मिली, मारुति को सुजुकी की टेक्नोलॉजी, मैनेजमेंट और एक्सपैंशन से ग्रोथ फायदा मिला और लोगों को एक किफायती कार ब्रांड मिला। जिसने विदेशी कार कंपनियों को भी मजबूर किया कि वो अपनी कार कीमतों को काबू में रखें।
आज मारुति का मार्केट कैप 4.5 लाख करोड़ रुपये है। हर साल मारुति 20 लाख के करीब कारें बेचती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए लिखा गया है। इसमें जिन शेयरों और कंपनियों का जिक्र किया गया है, वे उनके पिछले प्रदर्शन और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित हैं। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन होता है और पिछले रिटर्न भविष्य की गारंटी नहीं होते। निवेश से पहले निवेशकों को अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लेनी चाहिए या खुद स्वतंत्र रिसर्च करनी चाहिए। लेखक किसी भी तरह के लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।
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