सोना-चांदी में आखिर चल क्या रहा है? कभी रिकॉर्ड ऊंचाई तो कभी औंधे मुंह जमीन पर?

Gold Silver prices on a Wild Rollercoaster ride

आखिरकार सोने और चांदी में चल क्या रहा है. बीते कुछ दिनों से इन दोनों कीमती धातुओं ने कमोडिटी एक्सपर्ट्स की दिल की धड़कनों को बढ़ाकर रखा हुआ है. बीते एक साल में सोने और चांदी की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ी हैं, रोज नए रिकॉर्ड बने है. 29 जनवरी, 2026 को सोना वायदा ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में 5,626.80 डॉलर का रिकॉर्ड हाई बनाया, जबकि चांदी ने 121.785 डॉलर का रिकॉर्ड हाई बनाया था. लेिकन, शुक्रवार और सोमवार को कीमतें एक बार फिर गिरीं. इसके बाद मंगलवार और बुधवार को चढ़ने के बाद गुरुवार को इसमें फिर से एक बड़ी गिरावट देखने को मिल रही है.

गुरुवार को स्पॉट चांदी करीब 16.7% गिरकर 73.5565 डॉलर प्रति आउंस पर आ गई, चांदी वायदा भी 11% टूटकर 73.383 डॉलर प्रति आउंस तक लुढ़क गया. जबकि इसके पहले चांदी शुक्रवार को 27% तक टूटी थी. गुरुवार को सोना वायदा भी तकरीब 2% टूटकर 4,809.56 डॉलर तक फिसल गया.

अब सवाल ये है कि आखिर सोने और चांदी की कीमतों में ये रोलर-कोस्टर राइड देखने को मिल क्यों रही है? हालांकि इसकी कोई एक वजह नहीं है, पहले समझिए कि सोने में आखिर इतनी तेजी आई क्यों?

महंगे सोने की वजह: ट्रंप की परोसी गई अनिश्चितता

सोने की फितरत होती है कि जब दुनिया में हलचल मचती या वित्तीय संकट मुंह बाये सामने खड़ा हो तो ये अपना असली रंग दिखाता है, क्योंकि सोने को संकट के समय का हेज या इंश्योरेंस माना जाता है. पिछले साल जनवरी में जब डॉनल्ड ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति चुनकर आए, तो दुनिया को ये मालूम था कि अब कुछ भी पहले जैसा नहीं रहने वाला. ट्रंप अगली सुबह क्या कहेंगे और क्या करेंगे, शायद उन्हें खुद नहीं मालूम तो दूसरों को क्या ही कहा जाए. ट्रंप बीते एक साल में अनिश्चितता का पर्याय बन गए. बीते एक साल में हमने यही देखा है कि ट्रंप हमेशा कुछ न कुछ ऐसा बयान देते हैं और या फैसला करते हैं, जिससे पूरी दुनिया का फाइनेंशियल सिस्टम ही हिल जाता है, ये अनिश्चितता, अविश्वास और भय ही सोने के फलने-फूलने की खुराक है.

20 जनवरी, 2025 को इनॉगरेशन डे पर ट्रंप एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स की बौछार कर दी. भतेरों एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स पर साइन कर दिए, जैसे- कितने दिनों से भरे बैठे थे. इसमें ट्रेड पॉलिसी रिव्यू, डीरेगुलेशन और एनर्जी प्रोडक्शन बढ़ाने के ऑर्डर्स शामिल थे. पहले ही दिन से उन्होंने टैरिफ को लेकर धमकियां देना भी शुरू कर दिया. मैक्सिको, कनाडा और चीन पर टैरिफ की धमकी दी जो बाद में फरवरी में लागू भी हुई. शुरू में तो बाजार ने इसको पॉजिटिव लिया, डॉलर मजबूत हुआ, लेकिन टैरिफ की बातचीत जब थोड़ा तल्ख हुई तो वॉलिटिलिटी भी बढ़ी. नतीजा गोल्ड ने रफ्तार पकड़ना शुरू कर दिया, क्योंकि यहां से आभास होना शुरू हो गया कि आगे काफी गड्ढे हैं, ट्रंप का अगला कदम क्या होगा, ये अंदाजा लगाना बाजार के लिए मुश्किल हो गया था.

20 जनवरी, 2025 को जब डॉनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति की कुर्सी पर गद्दानशीन हुए, एक साल के भीतर ही सोने के भाव डबल हो गए और चांदी की कीमतें चार गुना तक बढ़ गईं. जब ट्रंप पिछले साल जनवरी में राष्ट्रपति बने तो सोना 2,700 डॉलर प्रति आउंस इर्द-गिर्द था, जो कि साल भर में ही ये 5,600 के ऊपर चला गया. चांदी भी 31 डॉलर से बढ़कर साल भर में 122 डॉलर प्रति आउंस तक पहुंच गई.

सोना-चांदी में आखिर चल क्या रहा है?

महंगे सोने की वजह: भारी कर्ज में डूबता अमेरिका

सोने-चांदी की चाल को देखकर कुछ एनालिस्ट मानते हैं कि इनकी कीमतें सिर्फ कोई रैंडम उछाल नहीं हैं, ये दुनिया भर की आर्थिक व्यवस्था में गहरे विश्वास के संकट को दर्शा रही है. क्योंकि कई सालों से महंगाई बनी हुई है, बड़े-बड़े देश कर्ज के बोझ तले दबे जा रहे हैं, इसमें भी अमेरिका सबसे आगे है. अमेरिका पर राष्ट्रीय कर्ज 38.5 ट्रिलियन डॉलर हो चुका है, जो कि दुनिया में सबसे ज्यादा है. ये कर्ज अमेरिका की GDP का 124-130% है. मतलब ये कि अमेरिका इस वक्त जो दुनिया का दादा बन रहा है, अपनी कमाई से ज्यादा कर्ज पर बैठा हैं.

इस कर्ज को चुकाने की बात तो दूर की है, इसका ब्याज ही हर साल 1 ट्रिलियन डॉलर देना होगा, जबकि इतना तो अमेरिका का डिफेंस बजट भी नहीं है. अब इस कर्ज को चुकाने के लिए अमेरिका नया कर्ज लेता है तो वो कर्ज के जाल में फंसता चला जाएगा, क्योंकि नया कर्ज पुराने से महंगा मिलेगा, और अगर वो नया डॉलर छापता है तो डॉलर कमजोर होगा. बस यही डर है जो काम कर रहा है और लोग सोने-चांदी की तरफ भाग रहे हैं. क्योंकि सोना इकलौता ऐसा असेट है, जो कोई ब्याज नहीं देता और न ही अमेरिका के राजनीतिक फैसलों का गुलाम है, बस वो है, और सबके लिए है.

सोना-चांदी में आखिर चल क्या रहा है?

महंगे सोने की वजह: डॉलर को किनारे लगाने की तैयारी

आप देख रहे होंगे कि बीते कुछ समय से चीन, भारत और तुर्की समेत दुनिया के कई सेंट्रल बैंकों ने टनों सोना इकट्ठा करना शुरू कर दिया है, जिससे डॉलर की हालत पतली हो रही है और सोना दौड़ रहा है. क्योंकि ये देश अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहते हैं. इसके पीछे की सोच क्या है, ये समझिए- दरअसल, डॉलर दुनिया की मुख्य रिजर्व करेंसी है, लेकिन ट्रंप की ‘एकतरफा’ टैरिफ पॉलिसी और फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल को लेकर उनके ‘सुविचारों’ और अमेरिका के बढ़ते कर्ज से अगर डॉलर ऐसे ही कमजोर होता चला गया तो इन देशों का रिजर्व सुरक्षित कैसे रहेगा.

इसलिए वो डॉलर की जगह पर सोना अपने रिजर्व में भर रहे हैं, क्योंकि ट्रंप के हाथ में डॉलर की लगाम तो हो सकती है, लेकिन सोना तो आजाद है. इसलिए दनादन डॉलर बेचा जा रहा है, बदले में सोना खरीदा जा रहा है. आखिरकार अपने हितों की रक्षा करने का अधिकार सबको है. यही वजह है कि वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की एक रिपोर्ट बताता है कि 2025 में सेंट्रल बैंकों ने करीब 328–863 टन सोना खरीदा. इसमें चीन और तुर्की दोनों ने 27 टन सोना खरीदा. ये खरीदारी सोने की कीमतों को सपोर्ट करती है, क्योंकि सेंट्रल बैंक बड़ी मात्रा में खरीदते हैं और लंबे समय तक होल्ड करते हैं.

सोना-चांदी में आखिर चल क्या रहा है?

फिर सोना-चांदी टूटे क्यों?

अब इसके दूसरे हिस्से पर आते हैं कि इतना चलने के बाद सोना गिर क्यों रहा है? हालांकि गिरने के कारणों पर एनालिस्ट्स थोड़ा बंट हुए है, फिर भी कारणों को समझना जरूरी है. ट्रंप ने शुक्रवार को ऐलान किया कि वो केविन वॉर्श को फेडरल रिजर्व का नया मुखिया बनाना चाहते हैं, इसके लिए उन्होंने वॉर्श का नामांकन कर दिया। हम सब जानते हैं कि मौजूदा चेयरमैन जेरोम पॉवेल, इसी साल के मध्य में रिटायर होने वाले है और उनके ट्रंप के साथ रिश्ते कुछ ज्यादा मधुर नहीं है. खैर- मुद्दा उनके निजी रिश्तों का नहीं, बल्कि वॉर्श का है. जो कि पहले भी फेड में रह चुके हैं. 2006 से 2011 के बीच. वॉर्श को पॉलिसी के मामले में हॉकिश माना जाता है. मतलब कि ब्याज दरें घटाने के पक्ष में ज्यादा नहीं दिखते हैं.

अब वॉर्श का चुनाव बाजार को पसंद इसलिए भी आया क्योंकि ट्रंप जो कि जेरोम पॉवेल पर लगातार इस बात का दबाव बनाते आए हैं कि ब्याज दरों को कम रखा जाए, एक ऐसे व्यक्ति का चुना जाना, जो दरों को लेकर सख्त रवैया रखता है, इससे ये संदेश जाता है कि वो ट्रंप की सोच पर नहीं बल्कि स्थितियों का आंकलन करके फैसला लेंगे. बाजार ने इसको पॉजिटिव लिया. कुछ एनालिस्ट्स का कहना है कि इससे अर्थव्यवस्था ज्यादा स्थिर दिखने लगी और डॉलर मजबूत हुआ. इसलिए सोने-चांदी में सेल ऑफ देखने को मिला. मगर, कुछ एनालिस्ट इस तर्क से राज़ी नहीं दिखे. उनका कहना है कि सोना-चांदी बहुत ज्यादा चल चुके थे, इसलिए ऊपर से थोड़ा हल्के हुए हैं. जो बिल्कुल नैचुरल है.

डिस्क्लेमर: ये आर्टिकल केवल आपकी जानकारी के लिए लिखा गया है, सोने और चांदी या किसी भी तरह के असेट में हमारी खरीदारी तरफ से खरीद या बिक्री की सलाह नहीं है. ये फैसला आप अपने वित्तीय सलाहकार के मशवरे पर करें.

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