इंडिगो में आखिर चल क्या रहा है? हजारों फ्लाइट्स कैंसिलेशन, एयरपोर्ट पर यात्रियों का हंगामा और फिर धड़ाधड़ टूटता शेयर, तो दूसरी तरफ प्रमोटर गंगवाल ग्रुप अपना हिस्सा बेचकर इंडिगो के साथ सेवा समाप्ती की तैयारी में जुटा है. प्रमोटर गंगवाल ग्रुप को ऐसा क्या दिख रहा है कि वो अपनी हिस्सेदारी बेचकर निकल रहा है और रिटेलर को क्या दिख रहा है कि वो इंडिगो की सवारी करने को बेताब है. ये विरोधाभास क्यों है और इसमें कौन सही है और कौन गलत? इसी को समझने की कोशिश करते हैं.
लगातार कम की हिस्सेदारी
साल 2022 से 2025 के बीच कई ब्लॉक डील्स के जरिए राकेश गंगवाल समूह ने अपनी हिस्सेदारी को बेचा है. इंडिगो के को-फाउंडर और पूर्व डायरेक्टर राकेश गंगवाल की इंडिगो में हिस्सेदारी सिर्फ 4.53% रह गई है. जबकि प्रमोटर ग्रुप की कुल हिस्सेदारी 5.85% है, जिसमें द चिंकरपू फैमिली ट्रस्ट जो कि राकेश गंगवाल की पत्नी शोभा गंगवाल से जुड़ी हुई है. उसकी 1.32% हिस्सेदारी है. ट्रस्टी के रूप में जेपी मॉर्गन ट्रस्ट कंपनी ऑफ डेलावेयर भी शामिल है.
ऐसा क्यों हुआ? इस कहानी को समझने के लिए फ्लैश बैक में चलते हैं. इंडिगो में दो फाउंडर्स थे. गंगवाल समूह और राहुल भाटिया का इंटरग्लोब एंटरप्राइजेज समूह (InterGlobe Enterprises/IGE). काफी समय तक दोनों की हिस्सेदारी 37% से ज्यादा हुआ करती थी. लेकिन राकेश गंगवाल ने 2022 में बोर्ड से इस्तीफा दे दिया, उसके बाद अपनी हिस्सेदारी को धीरे-धीरे कम करना शुरू कर दिया. नतीजा ये हुआ कि 2025 तक उनकी हिस्सेदारी घटकर महज 5.85% ही रह गई. गंगवाल ग्रुप ने साल 2022 से लेकर अबतक 7 बार ब्लॉक डील के जरिए अपनी हिस्सेदारी बेची है और इंडिगो में अपनी स्टेक को 29.64% कम किया है.
इसका मतलब है कि कंपनी की एक बड़ी हिस्सेदारी अब FIIs, DIIs के पास है. जबकि पब्लिक होल्डिंग बढ़कर 5.32% हो गई है. जो कि 2022 में 2% से भी कम हुआ करती थी. इसमें सबसे ज्यादा या बड़ा हिस्सा इंटरग्लोब एंटरप्राइजेज (IGE) समूह का है, जो कि 35.70% है, जो कि कंपनी का सबसे बड़ा व्यक्तिगत शेयरधारक भी है और इकलौता प्रमोटर भी है.
अब चलिए एक नजर डालते हैं, की कब-कब राकेश गंगवाल ने इंडिगो में अपना हिस्सा बेचा है.

इस एग्जिट का क्या मतलब
इंडिगो को-फाउंडर राकेश गंगवाल ग्रुप के स्टेक सेल को केवल ‘एग्जिट’ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे मौके पर चौका लगाने वाले फैसले के तौर पर भी देखा जाना चाहिए. गंगवाल समूह ने 2022 में हिस्सेदारी बेचनी शुरू की, जब एविएशन इंडस्ट्री कोविड महामारी की वजह से जमीन पर थी और नुकसान झेल रही थी. डेटा साफ दिखाता है कि सितंबर 2022 और फरवरी 2023 की डील्स के समय कंपनी का P/E रेश्यो निगेटिव था, मतलब कंपनी घाटे में चल रही थी, लेकिन 1,751 से 1,885 रुपये प्रति शेयर की दर पर शेयरों को बेचा गया.
मगर, गंगवाल ग्रुप की हिस्सा बिक्री को अगर सिर्फ कोविड से जोड़कर देखा जाए, तो तस्वीर अधूरी होगी. दरअसल, ये एक स्ट्रैटेजिक फैसला था. कोविड के दौरान जब एयरलाइन इंडस्ट्री सबसे कठिन दौर से गुजर रही थी, तभी गंगवाल और दूसरे प्रमोटर राहुल भाटिया के बीच कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए थे. गंगवाल ने सार्वजनिक रूप से मैनेजमेंट कंट्रोल, ट्रांजैक्शंस और पारदर्शिता पर सवाल उठाए. यही वो मोड़ था, जब गंगवाल ग्रुप ने ये किया कि वो कंपनी से बाहर निकलेंगे, क्योंकि कंपनी में उनकी पकड़ ढीली हो चुकी है. इसलिए यहां पर लंबे समय तक वो टिक नहीं सकते हैं. 2020 में गंगवाल ने इस बारे में सेबी को भी लिखा और गवर्नेंस खामियों के बारे में बताया.
मगर, सही समय पर बाहर निकलना एक अलग रणनीति थी. सितंबर 2022 से शुरुआत हुई, अगस्त 2023 से अगस्त 2025 के बीच इंडिगो ने जबरदस्त रिकवरी दिखाई पैसेंजर डिमांड रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची, मुनाफा तेजी से बढ़ा और शेयर अपने इतिहास के ऊंचे P/E वैल्युएशन पर ट्रेड करने लगा.
कितने PE पर बेची हिस्सेदारी
कब PE
सितंबर 2022: -ve
फरवरी 2023: -ve
अगस्त 2023: 25
मार्च 2024: 18
अगस्त 2024: 23
मई 2025: 30
अगस्त 2025: 33
इसी मजबूत दौर का फायदा उठाते हुए गंगवाल ग्रुप ने चरणबद्ध तरीके से हिस्सेदारी को बेचना जारी रखा. यहां ये समझना जरूरी है कि ये निराश होकर या मजबूर होकर उठाया गया कदम नहीं था, बल्कि पहले से तय किया हुआ एग्जिट प्लान था, जहां कारण थे गवर्नेंस से जुड़े मुद्दे और टाइमिंग थी ऊंची वैल्युएशन की. यहां ये समझने की भी जरूरत है कि प्रमोटर अगर हिस्सा बेच रहा है तो इसका मतलब हमेशा कमजोरी का संकेत नहीं है, बल्कि कई बार ये सही समय पर लिया गया रणनीतिक फैसला भी होता है. कोविड के बाद जब एविएशन सेक्टर खुला तो इंडिगो का ग्राफ भी आसमान पर पहुंच गया. जब अगस्त 2025 में गंगवाल ने ब्लॉक डील के जरिए हिस्सा बेचा तब PE मल्टीपल 33 का था.
IGE समूह ने हमेशा कहा कि इंडिगो का कॉरपोरेट गवर्नेंस मजबूत है और कंपनी प्रोफेशनली चलती रहेगी. शायद यही वजह है कि निवेशकों का कंपनी पर भरोसा कायम रहा, इसीलिए तो इतनी बड़ी प्रमोटर बिक्री के बावजूद, बाजार ने इंडिगो को सज़ा नहीं दी, क्योंकि ऑपरेशनल परफॉर्मेंस ने भरोसा बनाए रखा. ये इसके शेयर प्राइस पर भी दिखा. सितंबर 2022 में जब इंडिगो का शेयर प्राइस 1800 रुपये के करीब था, तीन साल बाद इसने 6,232 रुपये का हाई बनाया, यानी 71% का जबरदस्त उछाल देखने को मिला. इस पूरे मसले पर निवेशकों के लिए ये सीख है कि प्रमोटर हिस्सेदारी घटने को इकलौता ये मतलब नहीं होता कि इसको sell signal मान लिया जाए, उसका संदर्भ बहुत मायने रखता है, जैसा कि इंडिगो के केस में भी हुआ है. यह कोई पैनिक सेलिंग नहीं थी, बल्कि गवर्नेंस के मुद्दे से उपजी असहमति के बाद वैल्युएशन का फायदा उठाकर किया गया एग्जिट प्लान का हिस्सा था.
यानी गंगवाल ग्रुप का एग्जिट एक पहले से सोची समझी प्लानिंग का हिस्सा है, जबकि पब्लिक का इंडिगो में दिलचस्पी लेना एयरलाइन की परफॉर्मेंस की वजह से है, क्योंकि FY24–FY25 का समय इंडिगो के लिए सबसे शानदार रहा है. 2020 से लेकर 2023 तक कंपनी को लगातार घाटा हुआ, लेकिन मार्च 2024 के बाद कंपनी ने जबरदस्त मुनाफा कमाया. कंपनी का EPS भी बढ़ा. जिसने निवेशकों को भरोसा बढ़ाया. रिटेल निवेशक इंडिगो में लंबा खेलना चाहते हैं, ये फैसला उनके लिए कितना सही या गलत साबित होगा, ये वक्त पर छोड़ते हैं.
आपकी इस बारे में क्या राय है, जरूर बताएं. क्या प्रमोटर का समय समय पर हिस्सा बेचकर निकल जाना एक स्मार्ट मूव है, क्या गंगवाल जो देख पा रहे हैं, पब्लिक नहीं देख पा रही, या फिर पब्लिक इंडिगो को लेकर बुलिश है, वो सही है?
















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