Anthropic AI के खौफ से IT शेयरों में बीते कुछ दिनों से हम गिरावट देख रहे हैं, ऐसे कई दौर IT पहले भी देख चुका है, और उससे उबर भी चुका है. जब-जब दुनिया में कोई उथल-पुथल मची है, IT शेयरों ने तब तब घुटने टेके हैं. जो आज AI की वजह से हो रहा है, पहले वजह कुछ और थी, मगर पैटर्न यही है. IT शेयरों में आई ये गिरावट हर बार आशंकाओं से कहीं ज्यादा रही है. चाहे वो डॉट कॉम बबल का फूटना हो, ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस हो, कोविड हो या फिर डी-रेटिंग का दौर हो, IT सेक्टर हमेशा से ही भारी गिरावट झेलता आया है. अभी का ही हाल देख लीजिए, बीते एक साल के दौरान निफ्टी IT में 30-35% तक की गिरावट आ चुकी है.
निफ्टी IT अपने रिकॉर्ड पीक से 32% नीचे आ चुका है, 2026 YTD (जनवरी-फरवरी मिड तक) में ये करीब 12% तक गिर चुका है, लेकिन पूरे 2025-2026 पीरियड में AI और US फैक्टर्स से कुल करेक्शन 30-35% तक पहुंच गया है. बीते 9 सेशन में इस गिरावट से IT स्टॉक्स से 6 लाख करोड़ रुपये का मार्केट कैप साफ हो चुका है. अब जरा नज़र डालते हैं दूसरे मौकों पर जब IT शेयरों में सबसे बड़ी गिरावटें देखने को मिलीं थीं.
2000–2002: डॉट कॉम बबल का फूटना
Nifty IT Fall: 80% to 85%
2000–2002 में जब डॉट-कॉम बबल फूटा तो उस वक्त भारतीय IT कंपनियां अपने शबाब पर थीं. उस समय भारतीय IT कंपनियां जैसे इंफोसिस, विप्रो, सत्यम वगैरह Y2K प्रोजेक्ट्स के बाद तेज ग्रोथ पर थीं और ग्लोबल क्लाइंट्स से भारी आउटसोर्सिंग मिल रही थी. तेजी के घोड़े पर सवाल निफ्टी50 ने अपना पीक बनाया था, निफ्टी IT भी फर्राटा रफ्तार भर रहा था. मगर जब डॉट-कॉम बबल फूटा तो अमेरिका में इंटरनेट स्टार्टअप्स दिवालिया हो गए, IT पर खर्च एकदम से रुक गया है, जिसका सीधा असर भारत की IT कंपनियों पर पड़ा. निफ्टी IT ने पीक से 80-85% तक वैल्यू गंवाई, जिससे IT सेक्टर में हजारों लोगों की नौकरियां गईं, और कई कंपनियों की वैल्यूएशन सालों तक दबाव में रही. ये दौर सिखाता है कि IT सेक्टर ग्लोबल इकोनॉमिक साइकल्स से कितना सेंसिटिव है, जब US में टेक बबल फूटता है, तो भारत जैसे आउटसोर्सिंग हब सबसे ज्यादा चोट खाते हैं. रिकवरी भी धीमी थी, और इंडेक्स को 2000 के पीक तक लौटने में कई साल लगे.
2008–2009: ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस
Nifty IT Fall: 60% to 65%
2008–2009 की ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस तो आपको याद होगी, इसने भारतीय IT सेक्टर को उसकी जड़ों से हिला दिया था. अमेरिका और यूरोप में बैंकिंग सिस्टम के चरमराने, लीमन ब्रदर्स के बिखर जाने और स्लोडाउन के डर ने IT कंपनियों के सबसे बड़े क्लाइंट्स को ही संकट में डाल दिया. उस समय भारतीय IT कंपनियां जैसे इंफोसिस, TCS, विप्रो, HCLTech वगैरह अमेरिका और यूरोप के बड़े क्लाइंट्स पर 60-70% निर्भर थीं, और क्राइसिस के कारण इन क्लाइंट्स ने IT खर्चों में भारी कटौती कर दी. क्लाइंट्स के प्रोजेक्ट्स फ्रीज हो गए, नए कॉन्ट्रैक्ट्स रुक गए.
जैसे ही ग्लोबल कंपनियों ने कॉस्ट कटिंग की शुरुआत की, IT के खर्चों पर सबसे पहले चाबुक चला. इसका असर ये हुआ कि निफ्टी IT ने 2007-2008 के पीक से 2009 के बॉटम तक 60-65% की वैल्यू गंवाई, जिससे सेक्टर कई सालों तक रिकवरी मोड में रहा. हालांकि, 2009-2010 में जब ग्लोबल इकोनॉमी रिकवर हुई, तो भारतीय IT कंपनियों ने कॉस्ट कटिंग और आउटसोर्सिंग की बढ़ती डिमांड से मजबूत रिबाउंड भी दिखाया.
2011–2013: यूरोजोन संकट और अमेरिकी स्लोडाउन
Nifty IT Fall: 35% to 40%
2011–2013 का दौर भारतीय IT सेक्टर के लिए एक लंबे और दर्दनाक करेक्शन का दौर था, जब यूरोपियन डेट क्राइसिस और अमेरिकी इकोनॉमी के स्लोडाउन ने मिलकर निफ्टी IT इंडेक्स को पीक से 35% से 40% तक तोड़कर रख दिया था. ये गिरावट 2011 के मिड से शुरू हुई, जब यूरोजोन में बैंकों की अस्थिरता और सरकारी डेट क्राइसिस ने यूरोपीय क्लाइंट्स के IT बजट को कटौती के लिए मजबूर कर दिया. ग्रीस, स्पेन और इटली जैसे देशों की समस्याओं ने पूरे यूरोजोन को अनिश्चितता में डाल दिया. भारतीय IT कंपनियों की कमाई अमेरिका पर बहुत ज्यादा निर्भर थी तो यूरोप पर भी निर्भरता कुछ कम नहीं थी.
भारतीय IT कंपनियां जैसे TCS, इंफोसिस और विप्रो के यूरोप में काफी क्लाइंट्स थे, इस संकटे की वजह से प्रोजेक्ट्स में देरी, नए कॉन्ट्रैक्ट्स की कमी, और डिस्क्रेशनरी IT स्पेंडिंग में भारी कटौती होने लगी, नतीजा ये हुआ कि सेक्टर का रेवेन्यू ग्रोथ 25% से घटकर 10% के आसपास रह गया, स्टॉक्स में वैल्यूएशन डी-रेटिंग हुई, और कई कंपनियों ने कॉस्ट कटिंग के लिए लोगों को नौकरी से निकाला.
हालांकि, 2011–2013 की गिरावट ने भारतीय IT कंपनियों को लचीलापन दिखाने का मौका भी दिया, और 2013-2014 में जब यूरोजोन क्राइसिस थोड़ी संभली और अमेरिका में भी रिकवरी तेज हुई, तो निफ्टी IT ने जबरदस्त वापसी की. कई स्टॉक्स 50-70% ऊपर चढ़ गए.
March 2020: कोविड का संकट
Nifty IT Fall: 40%
2020 में जब पूरी दुनिया में कोविड ने दस्तक दी तो इससे भारत भी उछूता नहीं रहा, ये वो दौर पर जो सिर्फ बाजारों या इकोनॉमी के लिए ही बुरा नहीं था, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक खतरनाक दौर था. पूरी दुनिया घरों में सिमटकर रह गई . फ्लाइट्स बंद हो गईं और बिजनेसेज ठहर से गए. निवेशक घबराने लगे थे, मन में सैकड़ों सवाल घूम रहे थे कि आगे क्या होगा, क्या नहीं. ग्लोबल क्लाइंट्स ने तुरंत खर्चों को रोक दिया, प्रोजेक्ट्स में देरी हुई. इसी घबराहट में निफ्टी IT इंडेक्स महज़ कुछ हफ्तों में करीब 40% तक टूट गया. लेकिन इस क्रैश की खास बात यही थी कि डर जितना बड़ा था, रिकवरी उससे भी तेज़ निकली.
2022–2023: डी-रेटिंग फेज
Nifty IT Fall: 35%
2022–2023 का दौर भारतीय IT सेक्टर के लिए डी-रेटिंग फेज के नाम से जाना जाता है, जिसमें निफ्टी IT इंडेक्स पीक से 35% तक गिर गया था. यह गिरावट खास तौर से वैल्यूएशन डी-रेटिंग का नतीजा थी, किसी बड़े ग्लोबल क्राइसिस की वजह से ये सबकुछ नहीं हुआ था. कोविड के बाद 2020–21 में IT कंपनियों को डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन की जबरदस्त मांग मिली थी, ग्रोथ तेज़ थी और वैल्युएशंस अपने ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच चुके थे, लेकिन जैसे ही 2022 में अमेरिका और यूरोप में महंगाई बढ़ी, ब्याज दरें तेज़ी से ऊपर गईं और सेंट्रल बैंक्स ने लिक्विडिटी खींचनी शुरू की, निवेशकों के जोखिम लेने की क्षमता बढ़ गई.
इसका असर यह हुआ कि भले ही IT कंपनियां मुनाफ़ा कमा रही थीं, बाजार ने उन्हें पहले जैसे ऊंचे वैल्युएशन मल्टीपल देना बंद कर दिया और Nifty IT इंडेक्स करीब 35% तक फिसल गया. क्लाइंट्स ने IT स्पेंडिंग को कंट्रोल करना शुरू किया, तो इन कंपनियों के ग्रोथ प्रोजेक्शन और मार्जिन पर सवाल उठने लगे. विदेशी निवेशकों ने हाई-वैल्यूएशन IT स्टॉक्स से पैसा निकाला और दूसरे सेक्टर्स में शिफ्ट करने लगे. आज के AI खौफ और US स्लोडाउन से होने वाली 30% से 35% की गिरावट इस 2022-2023 के पैटर्न से काफी मिलती-जुलती है.
अब IT शेयरों में गिरावट का ये दौर कितना लंबा चलेगा, ये कह पाना अभी तो मुश्किल है. इसलिए IT को लेकर क्या रुख रहना चाहिए, खरीदारी करनी चाहिए या नहीं, क्या आगे और गिरावट आने वाली है, इन सभी सवालों को हम भविष्य के गर्भ में छोड़ते हैं.
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए लिखा गया है। इसमें जिन शेयरों और कंपनियों का जिक्र किया गया है, वे उनके पिछले प्रदर्शन और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित हैं। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन होता है और पिछले रिटर्न भविष्य की गारंटी नहीं होते। निवेश से पहले निवेशकों को अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लेनी चाहिए या खुद स्वतंत्र रिसर्च करनी चाहिए। लेखक किसी भी तरह के लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।
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