A Detailed Analysis: बाज़ार अनिश्चितता से डरता है, युद्ध से नहीं! इतिहास में हर संकट से रिकवर हुआ बाज़ार

A Deep Dive into historical Stock Market Recoveries

दुनिया के कुछ चुनिंदा सबसे प्रभावशाली स्टॉक मार्केट्स इन्वेस्टर्स में से एक पीटर लिंच का एक मशहूर कथन है – “बाज़ार अनिश्चितता को पसंद नहीं करता, और युद्ध अनिश्चितता पैदा करता है, लेकिन एक बार जब परिणाम स्पष्ट होने लगता है, तो बाज़ार संभलने लगते हैं, लड़ाई खत्म होने से पहले ही.”

मतलब ये कि जब दुनिया में जंग शुरू होती है तो शेयर मार्केट गिरता है, क्योंकि तब उसको ये मालूम नहीं होता है कि युद्ध कितना लंबा चलेगा. मगर एक बार जब इस बात के संकेत मिलने लगते हैं कि युद्ध की दिशा क्या है, क्या ये लंबा चलेगा, या फिर ये जल्द ही खत्म होगा, मार्केट अनिश्चितता के डर से बाहर निकल आता है और रिकवरी शुरू कर देता है.

शेयर बाज़ार में बीते दो दिनों से दमदार रिकवरी है. ईरान और अमेरिका के बीच सीज़फायर की उम्मीदों ने बाज़ार में नया जोश भर दिया है. आगे जंग पूरी तरह से रुकेगी या नहीं, इस पर तस्वीर अभी साफ नहीं है, लेकिन जंग, अस्थिरता का शेयर बाज़ार से पुराना राब्ता रहा है. कुछ चीजें डेटा के आधार पर साबित होती हैं और कुछ का इतिहास होता है, लेकिन बाज़ार के लिए डेटा ही उसका इतिहास है. जो कि ये बताता है कि हर लड़ाई और संकट के बाद बाज़ार रिकवर करता है.

डेटा दिखाता है कि युद्ध और जियो-पॉलिटिकल तनाव के दौरान रिकवरी का समय आमतौर पर 1 से 6 महीने के बीच रहता है. जैसे कि साल 2022 में रूस-यूक्रेन का यु्द्ध शुरू हुआ, जो कि आज भी चल रहा है, लेकिन मार्केट में रिकवरी 4 महीने बाद ही आना शुरू हो गई थी. यानी बाज़ार युद्ध के खत्म होने का इंतजार नहीं करता है. ऐसी ही 10 घटनाओं के बारे में बताने जा रहे हैं. जिनके शुरू होते ही बाज़ार में तनाव आया, लेकिन बाज़ार ने रिकवरी भी की.

1- Gulf War (1990)

2 अगस्त, 1990 को इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने अपने पड़ोसी देश कुवैत पर आक्रमण कर उसे अपने कब्जे में ले लिया. सद्दाम हुसैन की नज़र कुवैत में मौजूद तेल के कुओं पर थी. इसके जवाब में अमेरिका की अगुवाई में 35 देशों की गठबंधन सेना ने इराक के खिलाफ ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म’ चलाया था. जो कि 17 जनवरी 1991 से लेकर 28 फरवरी 1991 तक चला. अगर हमले से लेकर युद्धविराम तक देखें तो ये मोटा-मोटा ये जंग 7 महीने चली, लेकिन असल जंग तो सिर्फ 42 दिन की ही थी.

अगस्त में जब जंग शुरू हुई उससे ठीक पहले यानी जुलाई में सेंसेक्स 1,000 के स्तर पर हुआ करता था. 2 अगस्त को जैसे ही इराक ने कुवैत पर हमला किया, बाज़ार में घबराहट फैल गई, बाज़ार में कुछ ट्रेडिंग सेशन तक गिरावट आई. मगर, इसके बाद बाज़ार में कोई बहुत बड़ी गिरावट नहीं देखने को मिली, बल्कि सेंसेक्स अगस्त खत्म होने और सितंबर की शुरुआत में ही सेंसेक्स 1250 के ऊपर चला गया. फिर, अक्टूबर 1990 में सेंसेक्स ने 1,600 के बेहद करीब पहुंचकर नया हाई बनाया.

मगर, अक्टूबर 1990 में जो 1600 का हाई बना था, वह असल में एक Speculative Rally थी, बाज़ार को लग रहा था कि लड़ाई टल जाएगी. लेकिन जैसे ही जनवरी 1991 में अमेरिका जंग में कूदा, बाज़ार तेजी से गिर गया, जनवरी 1991 में ये गिरकर 1,000 के स्तर के नीचे फिसल गया. यानी सेंसेक्स अपने उच्चतम स्तर से करीब 35% से 40% तक टूट चुका था. सेंसेक्स को वापस से 16,00 के स्तर तक रिकवर होने में 5 महीने का वक्त लगा.

यहां पर एक बात गौर करने वाली ये है कि 1991 में बाज़ार के गिरने की इकलौती वजह केवल जंग नहीं थी, बल्कि भारत की अपनी अंदरूनी वजहें भी थीं. खाड़ी युद्ध के दौरान कच्चे तेल की कीमतें $17 से उछलकर $36 प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं. दूसरी तरफ, भारत के पास केवल 2 हफ्ते का इंपोर्ट करने का पैसा बचा था, बाज़ार इस आर्थिक कंगाली से भी डर रहा था. जब 1991 के मिड में आर्थिक सुधारों के दरवाजे खोलने की चर्चा चली, तब बाज़ार ने असली रिकवरी दिखाई.

2- Harshad Mehta Scam (1992)

22 अप्रैल, 1992 को सेंसेक्स 7.31% चढ़ा था, एक भयानक तूफान से अनजान था.इसके अगले ही दिन 23 अप्रैल, 1992 को फाइनेंशियल जर्नलिस्ट सुचेता दलाल शेयर बाज़ार के एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश करती हैं- हर्षद मेहता स्कैम. ये उस वक्त भारत का सबसे बड़ा फाइनेंशियल फ्रॉड माना गया. हर्षद मेहता ने ‘रेडी फॉरवर्ड डील’ और फर्जी बैंक रसीदों का इस्तेमाल करके बैंकों से बिना किसी गारंटी के पैसा निकाला और उसे मार्केट में झोंक दिया.

दिलचस्प बात ये है कि 23 और 24 अप्रैल, 1992 को BSE में कोई ट्रेडिंग नहीं हुई क्योंकि उस समय बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के ब्रोकर सरकार के एक नए नियम का विरोध कर रहे थे. सरकार ने SEBI को ज़्यादा ताकत देने और ब्रोकर्स के लिए ‘रजिस्ट्रेशन फीस’ जरूरी कर दिया था. ब्रोकर इस फीस और SEBI को ज्यादा ताकत देने के खिलाफ थे, इसलिए उन्होंने विरोध में हड़ताल कर दिया था.

मगर, इसके बाद 27 अप्रैल को जब बाज़ार खुला तो कोहराम मच गया. सेंसेक्स 12.7% तक टूट गया. सेंसेक्स 4,467 की ऊंचाई से एक साल में ही सेंसेक्स 54% तक टूट गया. ये गिरावट काफी लंबी चली, सेंसेक्स को वापस अपने हाई पर पहुंचने में 2 साल से ज्यादा का वक्त लगा.

3- Kargil War (1999)

मई 1999 में भारत को पता चला कि पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कारगिल की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया है. 26 मई 1999 को भारतीय वायुसेना ने ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ शुरू किया. दो परमाणु शक्ति वाले देशों के बीच जंग ने बाज़ार में पैनिक फैला दिया.

मई 1999 की शुरुआत में सेंसेक्स लगभग 3300-3400 के स्तर पर था, जैसे ही युद्ध की खबरें पुख्ता हुईं, निवेशकों में घबराहट फैल गई. युद्ध के शुरुआती हफ्तों में सेंसेक्स गिरकर 3050 के स्तर के करीब आ गया था, यानी बाज़ार में लगभग 7% से 10% का करेक्शन देखा गया. लेकिन दो महीने में ही बाजार में रिकवरी भी आ गई.

जून 1999 के मध्य तक ये पता चलने लगा था कि भारत ये युद्ध जीत रहा है, तो बाज़ार ने रिकवरी दिखाना शुरू कर दिया, बाज़ार ने युद्ध खत्म होने का इंतज़ार नहीं किया. जबकि 26 जुलाई 1999 को भारत के युद्ध जीतने की आधिकारिक घोषणा की गई. तब तक सेंसेक्स न केवल अपने पुराने स्तर पर लौटा, बल्कि उसने 4600 के स्तर को पार करते हुए नया रिकॉर्ड बना दिया.

4- Terror Attack of 9/11

11 सितंबर 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले ने पूरी दुनिया को हिला दिया था. NYSE को लगातार 4 दिनों के लिए बंद करना पड़ा. जब 17 सितंबर को अमेरिकी बाज़ार खुला, तो वह एक ही दिन में 7.1% गिर गया, जो उस समय की रिकॉर्ड गिरावट थी. भारतीय बाज़ार में भी’लोअर सर्किट’ की स्थिति बन गई, कुछ ही हफ्तों में सेंसेक्स गिरकर 2600 के नीचे फिसल गया. यानी निवेशकों ने 18% से 20% की भारी गिरावट देखी.

अक्टूबर 2001 के मध्य तक जब यह साफ हो गया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था इस झटके को झेल लेगी और अमेरिका स्थिति को संभाल रहा है, तो बाज़ार ने ‘V-Shape’ रिकवरी शुरू की. केवल 3 महीने में सेंसेक्स वापस अपने हमले से पहले वाले स्तर पर पहुंच गया.

5- Iraq War (2003)

20 मार्च 2003 को अमेरिका की अगुवाई वाली गठबंधन सेनाओं ने इराक पर हमला किया. युद्ध शुरू होने से पहले के कई महीनों तक दुनिया भर के बाज़ारों में भारी डर और अनिश्चितता का माहौल था. फरवरी और मार्च 2003 की शुरुआत में भारतीय बाज़ार पहले से ही भारी दबाव में चल रहा था. मार्च 2003 के मध्य में सेंसेक्स गिरकर 3000 के नीचे फिसल गया था.

निवेशकों को डर था कि अगर युद्ध लंबा खिंचा, तो तेल की कीमतें आसमान छू लेंगी और ग्लोबल मंदी आ जाएगी. मगर, हुआ इसका ठीक उल्टा. जैसे ही 20 मार्च को पहला बम गिरा और अमेरिका ने इराक पर हमला शुरू किया, बाज़ार गिरने के बजाय बढ़ने लगा. इसके पीछे वजह थी कि बाज़ार जिस अनिश्चितता में जी रहा था, वो खत्म हो गई. बाज़ार को समझ आ गया कि अब तो जंग शुरू हो चुकी है.

केवल 2 महीने यानी मई 2003 तक में बाज़ार न केवल रिकवर हुआ, बल्कि एक नए ‘बुल रन’ की शुरुआत हो गई. मई 2003 के अंत तक सेंसेक्स वापस 3200 के पार निकल गया और साल के अंत तक इसने 5000 का स्तर को भी छू लिया.

6- Global Financial Crisis (2008)

15 सितंबर 2008 को जब अमेरिका का दिग्गज इन्वेस्टमेंट बैंक ‘लीमन ब्रदर्स’ दिवालिया हो गया, तो पूरी दुनिया के बैंकिंग सिस्टम से ‘भरोसा’ खत्म हो गया. विदेशी फंड्स (FIIs) ने भारतीय बाज़ार से रिकॉर्ड पैसा निकाला. जनवरी 2008 में सेंसेक्स अपने उस समय के ऐतिहासिक हाई 21,200 के स्तर पर था.

अक्टूबर 2008, लीहमन ब्रदर्स के डूबने के बाद बाज़ार में हाहाकार मच गया. सेंसेक्स गिरकर 8,000 के नीचे फिसल गया. बाज़ार अपनी ऊंचाई से 60% से टूट गया. युद्ध में जीत या हार तो दिख जाती है, लेकिन मंदी में अनिश्चितताओं के बादल छंटने में समय लगता है. जब तक सरकारों ने ‘बेलआउट पैकेज’ और ब्याज दरों में कटौती का ऐलान नहीं किया, तब तक बाज़ार नहीं संभला.

करीब मार्च 2009 के बाद से रिकवरी शुरू हुई और 2010 के मध्य तक बाज़ार पुराने स्तर पर लौट आया.

7- COVID Pandemic (2020)

मार्च 2020 में जब कोरोना वायरस को ‘वैश्विक महामारी’ घोषित किया गया और भारत समेत पूरी दुनिया में ‘लॉकडाउन’ लगा, तो निवेशकों में ऐसा डर फैला जो दशकों में नहीं देखा गया था.
फरवरी 2020 में निफ्टी अपने उस समय के हाई 12,430 के करीब था, लेकिन मार्च के केवल 2-3 हफ्तों में जो हुआ, ऐसा कभी नहीं देखा गया.

23 मार्च 2020 को भारतीय बाज़ार में इतिहास की सबसे बड़ी इंट्राडे गिरावट आई, और ट्रेडिंग को कुछ समय के लिए रोकना पड़ा. निफ्टी गिरकर 7,511 के स्तर पर आ गया. केवल एक महीने में ही बाज़ार 38% से 40% तक स्वाहा हो गया.

लेकिन सरकारों ने और केंद्रीय बैंकों ने बाजार को संभाला. जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा. बाज़ार ने वैक्सीन आने या बीमारी खत्म होने का इंतज़ार नहीं किया. यही वजह रही कि अक्टूबर 2020 में निफ्टी वापस अपने पुराने हाई 12,400+) पर पहुंच गया. दिसंबर 2020 तक बाजार में ‘सुपर बुल रन’ आया और निफ्टी अगले साल 18,000 के पार पहुंचा गया.

8- Russia-Ukraine War (2022)

24 फरवरी 2022 को रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया. पूरी दुनिया में इसे लेकर डर फैल गया कि कच्चा तेल महंगा हो जाएगा. हुआ भी यही, कच्चा तेल $130 प्रति बैरल के पार चला गया, जिससे भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए ‘महंगाई’ का डर सबसे बड़ी अनिश्चितता बन गया.

युद्ध शुरू होने से पहले यानी फरवरी की शुरुआत में बाज़ार में तनाव दिखने लगा था. फरवरी 2022 में निफ्टी लगभग 17,600 के स्तर पर था. हमले की खबर आते ही बाज़ार में तेज गिरावट आई और 8 मार्च 2022 तक निफ्टी गिरकर 15,671 के स्तर पर आ गया, यानी लगभग 11-12% का सीधा क्रैश देखने को मिला.

जैसे ही इस पर स्पष्टता आई कि युद्ध यूक्रेन की सीमाओं तक सीमित रहेगा और वैश्विक स्तर पर ‘तीसरा विश्व युद्ध’ नहीं होगा, बाज़ार ने संभलना शुरू किया. जून 2022 तक बाज़ार ने ऊंची तेल कीमतों और महंगाई डिस्काउंट कर लिया था. निवेशकों को समझ आ गया कि युद्ध लंबा खिंच सकता है, लेकिन दुनिया की अर्थव्यवस्था नहीं रुकेगी.

आज इस युद्ध को तकरीब चार साल से ज्यादा हो चुके हैं, युद्ध अभी चल ही रहा है और बाज़ार काफी आगे बढ़ चुका है. केवल 4 महीने में ही, यानी जुलाई 2022 में ही निफ्टी ने रिकवरी दिखाना शुरू कर दिया था. निफ्टी वापस 17,500-17,600 के अपने हाई पर पहुंच गया.

तो इससे क्या बात समझ आती है, बाज़ार किसी घटना से नहीं, बल्कि उस घटना के ‘अंजाम’ की अनिश्चितता से डरता है. बाज़ार को अब समझ आने लगा है कि दुनिया इन संकटों के बीच भी आगे बढ़ना सीख चुकी है. निवेशकों के लिए सबक ये है कि युद्ध छिड़ते ही बाज़ार से भागना समझदारी नहीं है.

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए लिखा गया है। इसमें जिन शेयरों और कंपनियों का जिक्र किया गया है, वे उनके पिछले प्रदर्शन और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित हैं। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन होता है और पिछले रिटर्न भविष्य की गारंटी नहीं होते। निवेश से पहले निवेशकों को अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लेनी चाहिए या खुद स्वतंत्र रिसर्च करनी चाहिए। लेखक किसी भी तरह के लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।

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