जनवरी-फरवरी की मार, हर बार पोर्टफोलियो बीमार! 10 साल में 8 बार निफ्टी रहा निगेटिव

पूरे साल में दो महीने ऐसे होते हैं, जिनमें शेयर बाज़ार गिरता ही गिरता है। वो महीने हैं जनवरी और फरवरी। जी, अभी जनवरी का महीना चल ही रहा है और इस महीने अभी तक निफ्टी करीब 1.7% गिर चुका है, जबकि अभी आधा महीना बाकी है। अब देखना ये होगा कि बाकी बचे दिनों में निफ्टी रिकवर होता है या इसमें और गिरावट आती है। अगर बीते 10 सालों की ट्रेंड की बात करें तो कहानी ये निकलकर सामने आती है कि जनवरी और फरवरी का महीना आपके पोर्टफोलियो पर भारी रहा है। अब ऐसा क्यों होता है? आखिर क्यों इन दो महीनों में बाजार की चाल उल्टी हो जाती है, जबकि पूरी दुनिया में इन महीनों में बाजार गुलजार रहते हैं।

जनवरी-फरवरी में बाजार की उल्टी चाल

पहले बात जनवरी की करते हैं, बीते 10 सालों में जनवरी में निफ्टी, सेंसेक्स, निफ्टी स्मॉलकैप, निफ्टी मिडकैप ने 8 बार निगेटिव रिटर्न दिया है। यानी बीते 10 साल में सिर्फ 2 ही बार ऐसा हुआ है कि इन्होंने आपके पोर्टफोलियो में कुछ जोड़ा हो। वो दो साल 2017 और 2018 हैं, जब निफ्टी ने 4.6% और 4.7% के पॉजिटिव रिटर्न दर्ज किए, बाकी सालों में कहानी उल्टी ही रही। सबसे तेज गिरावट 2016 में हुई, जब निफ्टी करीब 5% गिरा। इसके बाद 2021 और 2023 में 2.5% की गिरावट आई, जबकि 2020 में 1.7% फिसला। साल 2025 भी ज्यादा अलग नहीं रहा, साल 2025 में तो रिकॉर्ड 78,000 करोड़ रुपये की बिकवाली विदेशी निवेशकों ने की है। अगर बीते 10 साल में निफ्टी के रिटर्न का औसत हिसाब किताब लगाएं तो ये निगेटिव 0.5% है।

जनवरी महीने में रिटर्न

  • Nifty: बीते 10 साल में 8 बार निगेटिव रिटर्न
  • Sensex: बीते 10 साल में 8 बार निगेटिव रिटर्न
  • Nifty Midcap: बीते 10 साल में 8 बार निगेटिव रिटर्न
  • Nifty Smallcap: बीते 10 साल में 8 बार निगेटिव रिटर्न
बीते 10 साल में जनवरी में निफ्टी का रिटर्न
सालजनवरी रिटर्न
2016-4.82%
2017+4.60%
2018+4.76%
2019-0.03%
2020-1.7%
2021-2.48%
2022-0.08%
2023-2.45%
2024-0.03%
2025-0.58%

फरवरी में भी वही ट्रेंड

अब बात फरवरी की, बीते 10 सालों में ऐसा 7 बार हुआ है कि जब निफ्टी ने 7 बार निगेटिव रिटर्न दिया है, 7 बार सेंसेक्स ने भी निगेटिव रिटर्न दिया है। लेकिन मिडकैप और स्मॉलकैप का हाल इससे भी ज्यादा बुरा रहा है, इन दोनों इंडेक्स ने 10 सालों में 9 बार निगेटिव रिटर्न दिया है।

फरवरी महीने में रिटर्न

  • Nifty: बीते 10 साल में 7 बार निगेटिव रिटर्न
  • Sensex: बीते 10 साल में 7 बार निगेटिव रिटर्न
  • Nifty Midcap: बीते 10 साल में 9 बार निगेटिव रिटर्न
  • Nifty Smallcap: बीते 10 साल में 9 बार निगेटिव रिटर्न
बीते 10 साल में फरवरी में निफ्टी का रिटर्न
सालफरवरी रिटर्न
2016-7.62%
20173.72%
2018-4.85%
2019-0.36%
2020-6.36%
20216.56%
2022-3.46%
2023-2.03%
20241.18%
2025-5.89%

आखिर वजह क्या है?

अब सवाल ये है कि ऐसा होता क्यों है, आखिर क्यों जनवरी और फरवरी के महीने में जब हवाएं सर्द हो जाती हैं, बाजार भी ठंडा पड़ जाता है। तो इसकी कोई एक वजह नहीं है, कई कारण है। थोड़ा आसान भाषा में आपको समझाने की कोशिश करते हैं।

FIIs की पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग

विदेशी निवेशक नए कैलेंडर ईयर की शुरुआत में पोर्टफोलियो रीसेट करते हैं, यानी नए साल में अपने पोर्टफोलियो को रिस्क-रिटर्न प्रोफाइल के हिसाब से एडजस्ट करते हैं, इसे पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग भी कहते हैं। इस दौरान विदेशी निवेशक इमर्जिंग मार्केट्स से अपना पैसा निकालकर दूसरे एसेट क्लास में शिफ्ट करते हैं, जैसे अमेरिकी बॉन्ड्स, डॉलर लिंक्ड एसेट्स और विकसित देशों के शेयर बाजारों में। इन इमर्जिंग मार्केट्स में भारत भी शामिल है। यही वजह है कि इन दो महीनों में भारतीय बाजारों पर FIIs की तरफ से जबरदस्त बिकवाली का दबाव देखने को मिलता है। बीते 10 साल के डेटा बताते हैं कि जनवरी और फरवरी में FIIs ज्यादातर सालों में नेट सेलर्स रहे हैं। साल 2025 को ही देख लीजिए, जनवरी 2025 में FIIs ने 78,000 करोड़ रुपये की बिकवाली की थी।

Q3 नतीजों का सीजन, निवेशकों की उम्मीदें

Q3 Earnings Season की शुरुआत होती है, कॉरपोरेट्स अपने तिमाही नतीजे जारी करते हैं। बाजार उम्मीदों और आशंकाओं के बीच झूलता है। निवेशक उम्मीद करते हैं कि Q3 के नतीजे मजबूत होंगे, मैक्रो और कंजम्पशन डिमांड को लेकर सेंटीमेंट पॉजिटिव रहता है। जिसमें IT, ऑटो, FMCG जैसे सेक्टर्स से उम्मीद रहती है कि ये वापसी करेंगे। इसके पहले फेस्टिव सीजन गुजरा होता है। डिमांड स्लोडाउन होती है, जिसकी वजह से हम अक्सर IT, FMCG, ऑटो के नतीजों में निराशा देखने को मिलती है। अगर नतीजे ठीक-ठाक भी आते हैं तो निवेशकों की उम्मीदें ज्यादा रहती हैं।
यानी निवेशकों की उम्मीदें और असलियत में नतीजों में काफी फर्क देखने को मिलता है। जिसकी वजह से बाजार पर दबाव देखने को मिलता है।

प्री-बजट अनिश्चितता

जनवरी शुरू होते ही बजट को लेकर चर्चाएं शुरू हो जाती हैं। इंडस्ट्री बजट से ढेरों उम्मीदें लगाकर रखती है और बाजार अनिश्चितताओं के बीच घूमता है। बाजार बजट घोषणाओं से पहले वेट एंड वॉच के मोड में रहता है और अक्सर बजट ऐलानों से पहले दबाव में रहता है और गिरता है। इसके बाद जब 1 फरवरी को बजट पेश होता है, अगर बाजार को बजट पसंद नहीं आता है, तब बाजार में भारी बिकवाली का दबाव दिखता है। जैसा कि पिछले बजट में हुआ था। बजट पेश होने के बाद निफ्टी और सेंसेक्स में बड़ी गिरावट देखने को मिली थी।

बजट में कंपनियों को डर होता है कि सरकार टैक्स, इंसेटिव्स और सब्सिडीज में बदलाव न कर दे, जो उनके खिलाफ हों। निवेशकों को डर होता है कि इससे कॉरपोरेट प्रॉफिट पर कोई निगेटिव असर तो नहीं पड़ेगा और FIIs की नजर पॉलिसी स्टेबिलिटी पर रहती है। इसलिए वो ज्यादा बड़े दांव नहीं लगाते हैं।

कारण और भी हो सकते हैं, लेकिन मोटे तौर पर हर बार यही वजहें सामने आती हैं और ये एक पैटर्न में चलती हैं।

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