जब भी हम किसी कंपनी में पैसा लगाने का मन बनाते हैं, तो हम कई पहलुओं या फंडामेंटल्स पर नजर रखते हैं, कंपनी करती क्या है, उसका मैनेजमेंट कैसा है, उसकी योजनाएं क्या हैं, उसका प्रमोटर कौन है, कैश कितना है, कर्ज कितना है और कई तरह के फाइनेंशियल रेश्यो. वैसे भी बड़े बुजुर्ग कह गए हैं, कंपनी के शेयर में नहीं उसके बिजनेस में पैसा लगाओ. इसलिए एक और पैरामीटर हमें जरूर ध्यान में रखना चाहिए, वो है गिरवी शेयर. प्रमोटर कई बार अपने शेयरों को बैंकों के पास गिरवी रखकर पैसा उठाते हैं, इसमें कोई बुराई नहीं है, बहुत से बिजनेसेज ऐसा करते हैं, लेकिन एक हद से ज्यादा शेयरों को गिरवी रख दिया जाए, तो इसका सीधा असर कंपनी की परफॉर्मेंस और फिर उसके शेयर प्राइस पर दिखता है. कंपनी आगे चलकर किसी वित्तीय संकट में भी फंस सकती है.
अगर किसी कंपनी का प्रमोटर 25% तक शेयरों को गिरवी रखता है तो इसे नियंत्रण में माना जाता है, मतलब ज्यादा रिस्क नहीं है. अगर ये 60% या 80% तक पहुंच जाए तो बड़े खतरे का संकेत हो जाता है. हम यहां पर आपको ऐसी 10 कंपनियों की लिस्ट दे रहे हैं, जिनके प्रमोटर्स ने 51% से लेकर 100% तक शेयरों को गिरवी रखा है. इसका मतलब ये हुआ कि सिर्फ एक मार्जिन कॉल से इन कंपनियों के शेयरों में बड़ी गिरावट दिख सकती है.
चलिए पहले हम शेयरों के ‘प्लेजिंग’ या ‘गिरवी’ के विषय को समझते हैं. क्या ये कोई खराब प्रैक्टिस है? आखिर प्रमोटर्स को जरूरत क्या पड़ती है कि वो अपने शेयरों को गिरवी रखें और इसका असर शेयरों की कीमत पर कैसे पड़ता है.
शेयर गिरवी हैं, सोच-समझकर निवेश करें
| कंपनी | प्रमोटर के गिरवी शेयर |
| Thyrocare Technologies | 100% |
| Orient Green Power | 100% |
| Steel Exchange India | 100% |
| Bajaj Hindusthan Sugar | 100% |
| Gokuldas Exports | 96% |
| Websol Energy System | 88% |
| Patel Engineering | 87% |
| Nazara Technologies | 56% |
| Eureka Forbes | 54% |
| Indusind Bank | 51% |
प्रमोटर्स क्यों गिरवी रखते हैं शेयर
जब किसी कंपनी को अपना रोजमर्रा का कामकाज चलाने के लिए, बिज़नेस को आगे बढ़ाने के लिए या विस्तार करने के लिए पैसों की जरूरत होती है, तो उसके पास कई रास्ते होते हैं. QIP, कॉरपोरेट बॉन्ड्स, FPO वगैरह. एक और तरीका होता है कि वो बैंकों से लोन ले ले. आमतौर पर जब कंपनियां बैंकों से लोन के लिए अप्लाई करती हैं तो बैंक्स कंपनियों से कॉलेटरल के तौर पर प्रमोटर्स के शेयर्स मांगते हैं. इसे ही ‘प्लेजिंग’ कहते हैं. कंपनियां शेयरों को गिरवी रखकर पैसा लोन पर उठाने का रास्ता तभी चुनती हैं, जब बाकी दूसरे रास्ते मुश्किल हो जाते हैं या फिर किसी कारण की वजह से संभव नहीं हो पाता.
‘गिरवी शेयर’ का सिस्टम काम कैसे करता है?
जब कोई बैंक किसी कंपनी को उसके शेयरों के बदले लोन देता है, तो ऐसा नहीं है कि शेयरों की पूरी कीमत के हिसाब से उसको लोन मिल जाता है. बैंक कंपनी के शेयर प्राइस के 50% पर लोन देती है. RBI का नियम भी यही है कि लोन-टू-वैल्यू रेश्यो 50% मेनटेन रखना होगा. मतलब अगर किसी कंपनी के शेयर का प्राइस 1,000 रुपये है, तो उस कंपनी को एक शेयर गिरवी रखने पर सिर्फ 500 रुपये ही लोन मिलेगा. मान लीजिए कि किसी कंपनी को 10,00,000 लाख रुपये का लोन चाहिए, तो उसे 2,000 शेयर गिरवी रखने होंगे.
लोन की रकम और शेयर प्राइस के बीच ये जो 50% का गैप होता है, वो दरअसल बैंक सिक्योरिटी की तरह से इस्तेमाल करता है. क्योंकि बाजार में उतार-चढ़ाव तो आते रहते हैं. मान लीजिए कि कंपनी के शेयरों की कीमत 1,000 रुपये से गिरकर 800 रुपये हो जाती है, तब बैंक कंपनी से इस गैप की भरपाई के लिए और शेयर कॉलेटरल के तौर पर मांगता है या फिर कैश मांगता है. अगर कंपनी ऐसा करने में नाकाम रहती है तो उन शेयरों की ओनरशिप बैंक के पास चली जाती है, तब बैंक उन शेयरों को बेचकर अपना घाटा पूरा करता है. इसे ही मार्जिन कॉल ट्रिगर होना कहते हैं.
गिरवी शेयर और इसका असर
- प्रमोटर्स के गिरवी शेयरों को अगर बैंक बेचता है तो कई बार इसके गंभीर नतीजे देखने को मिलते हैं. जैसे ही बैंक उन शेयरों को मार्केट में बेचता है, उसकी सप्लाई बढ़ जाती है और शेयरों की कीमत गिरने लगती है. कई बार ऐसा भी होता है कि इस खबर से ही सेंटीमेंट्स बिगड़ जाते हैं और दूसरे निवेशक भी शेयरों को बेचना शुरू कर देते हैं जिससे कीमतें और नीचे आने लगती हैं.
- प्रमोटरों के शेयरों को गिरवी रखना बाजार में कंपनी की इमेज और निवेशकों के मन में विश्वास पर सीधा असर डालता है. जब प्रमोटरों के बहुत ज्यादा शेयर जैसे 50-100% गिरवी होते हैं, तो ज्यादातर निवेशक इसे नकारात्मक नजर से देखते हैं। वे सोचते हैं कि कंपनी या प्रमोटर को पैसे की सख्त जरूरत है यानी वो वित्तीय दबाव से गुजर रहा है या फिर प्रमोटर को कंपनी के भविष्य पर पूरा भरोसा नहीं है. इस वजह से स्टॉक पर नेगेटिव सेंटिमेंट बनता है, लोग कम खरीदते हैं, और शेयर की कीमत पर दबाव पड़ता है।
- अगर प्रमोटर्स ने एक बड़ी संख्या में शेयरों को गिरवी रखा हुआ है, तो जाहिर है मोटा लोन भी उठाया होगा और उसके लिए ज्यादा ब्याज भी चुका रहा होगा. ऐसे में कंपनियों के लिए बिजनेस से प्रॉफिट बनाना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा तो लोन के ब्याज चुकाने में चला जाता है. ऐसे में कंपनी भविष्य में कमाई कैसे करेगी इस पर सवालिया निशान लग जाता है.
- कंपनी का प्रमोटर कंपनी में मैनेजमेंट कंट्रोल तक खो सकता है, अगर वो लोन को चुका नहीं पाया. मान लीजिए कि प्रमोटर्स के पास कंपनी के 55% शेयर हैं. उसने 30% शेयरों को गिरवी रखकर लोन उठाया है, लेकिन किसी वजह से वो लोन को चुका नहीं पाता है, ये शेयर्स अब बैंक के पास ट्रांसफर हो जाएंगे. तब बैंक इन शेयरों को बेच सकता है, अगर ऐसा हुआ तो प्रमोटर्स के पास सिर्फ 25% शेयरहोल्डिंग ही रह जाएगी, तब कंपनी का कंट्रोल भी उसके हाथ से जाने का खतरा हो सकता है.
ऐसी कंपनियों में निवेशकों के लिए क्या सबक है?
जैसे हर चमकती चीज सोना नहीं होती, वैसे ही हर सस्ता शेयर वैल्यू एडिशन वाला नहीं होता. ऐसी कंपनियां जिनके प्रमोटर्स ने बड़ी संख्या में शेयरों को गिरवी रखा हुआ है, उनके शेयर आमतौर पर कम कीमत पर ट्रेड कर रहे होते हैं, कई बार निवेशकों को ये वैल्युएशन काफी आकर्षक लग सकते हैं. मगर, यहां समझने वाली बात ये है कि ये शेयर जो आकर्षक वैल्यू पर दिख रहे हैं और ऐसा लगता है कि वो आपके पोर्टफोलियो में कोई वैल्यू जोड़ रहे हैं, तो ऐसा नहीं है. क्योंकि ऐसी कंपनियां मोटा ब्याज चुका रहीं होती है और फ्यूचर ग्रोथ भी बहुत धीमी होती है. कई बार उनकी कमाई से ज्यादा ब्याज का हिस्सा होता है.
मगर, यहां पर एक और बात साफ करना जरूरी है कि जैसा कि ऊपर बताया है कि कॉरपोरेट इंडिया में शेयरों को गिरवी रखकर लोन लेना कोई बुरी बात नहीं है. अगर प्रमोटर ने शेयरों को गिरवी रखा है लेकिन कंपनी का ऑपरेटिंग कैश फ्लो लगातार बढ़ रहा है, कंपनी के फंडामेंटल्स बढ़िया हैं, कंपनी का भविष्य अच्छा दिख रहा है, तो ऐसे शेयरों में निवेश किया जा सकता है. क्योंकि ऐसी कंपनियां लोन के पैसों का इस्तेमाल बिजनेस को आगे बढ़ाने, विस्तार योजनाओं में लगाती है ताकि रेवेन्यू बढ़ाया जा सके. तो जाहिर है कंपनी भविष्य में तरक्की करेगी, तब ये माना जाता है कि कंपनी ने लोन के पैसों का सही इस्तेमाल किया है.
मतलब ये कि ऐसी कंपनियां जिनके प्रमोटर्स ने शेयरों को गिरवी रखा है, उसमें ये देखना है कि कितने शेयरों को गिरवी रखा है, क्या कंपनी उस लोन को चुकाने में सक्षम है, उसका ऑपरेटिंग प्रॉफिट, कैश फ्लो, बिजनेस विस्तार कैसा है. ये सारी चीजें देखना बहुत जरूरी है.
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए लिखा गया है। इसमें जिन शेयरों और कंपनियों का जिक्र किया गया है, वे उनके पिछले प्रदर्शन और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित हैं। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन होता है और पिछले रिटर्न भविष्य की गारंटी नहीं होते। निवेश से पहले निवेशकों को अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लेनी चाहिए या खुद स्वतंत्र रिसर्च करनी चाहिए। लेखक किसी भी तरह के लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।
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