US-Iran Ceasefire: भारतीय बाजार के लिए 2 हफ्ते का हनीमून या रिकवरी की शुरुआत?

US-Iran Ceasefire impact Indian Markets 2 Weeks of Relief or Beginning of Recovery

एक पल में ऐसा लगता है कि सबकुछ खत्म होने को है, चीज़े काबू से बाहर हो रही हैं, लेकिन अगले ही पल सबकुछ बदल जाता है. बीते कुछ हफ्तों से दुनिया भर के बाज़ारों में ऐसा ही हो रहा है, लेकिन मंगलवार को जो हुआ, उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी, क्योंकि पहले तो ट्रंप ने ईरान की पूरी मानव सभ्यता को ही खत्म करने का ऐलान कर दिया था. मगर, हुआ क्या, दो हफ्ते का सीज़फायर और इस बार ईरान ने भी इनकार नहीं किया. जो बात बिगड़ती हुई लग रही थी, बाज़ार टूटने को तैयार बैठे थे- अचानक से चीजें संभल गईं, सीजफायर की खबर के बाद डाओ फ्यूचर्स, नैस्डैक फ्यूचर्स 2.5-3% तक उछल गए और कच्चा तेल टूटने लगा.

लेकिन इस सीज़फायर का भारतीय बाज़ारों के लिए क्या मायने है. क्या ये सिर्फ 2 हफ्ते का हनीमून पीरियड है, इसके बाद फिर उन्हीं हालातों से जूझना होगा. क्या FIIs भारतीय बाज़ारों की ओर रुख करेंगे, क्या बाज़ार फिर से वो स्थायित्व हासिल कर पाएगा या फिर ये सिर्फ एक टेम्पररी फेज़ है. भारतीय बाज़ारों की डोर आगे भी वैश्विक रंगमंच से ही कंट्रोल होगी. यानी अगर 2 हफ्ते बाद फिर से चीजें बिगड़ने लगीं बाज़ार में त्राहिमाम शुरू हो जाएगा. इन सवालों के जवाब निवेशक जानना चाहते हैं.

US-ईरान सीज़फायर का भारत पर क्या असर?

इसमें कोई शक नहीं कि एक लंबी काली रात के बाद 8 अप्रैल 2026 की सुहानी सुबह भारतीय शेयर बाज़ारों ने देखी है. दलाल स्ट्रीट पर जो रौनक है, उसकी सबसे बड़ी वजह ये सीज़फायर ही है. सेंसेक्स और निफ्टी 4% से ज्यादा उछल गए. निफ्टी ने 11 मार्च, 2026 के बाद पहली बार 24,000 का स्तर पार किया. सेंसेक्स भी 77,600 के पार पहुंचा.

भारतीय बाज़ारों में ये रैली खासतौर पर कच्चे तेल की कीमतों में 13-15% की भारी गिरावट की वजह से आई, जो जियो-पॉलिटिकल तनावों में कमी आने के बाद हुई. जून डिलीवरी के लिए ब्रेंट फ्यूचर्स 9.75% टूटकर $94.84 प्रति बैरल पर आ गए. इधर, S&P 500 फ्यूचर्स ने संकेत दिया कि अमेरिकी इंडेक्स भी रिकॉर्ड तेजी के साथ खुल सकते हैं. इससे साफ पता चलता है कि भारतीय बाजार की रैली वैश्विक स्तर पर सिंक्रोनाइज्ड राहत रैली का हिस्सा है. मतलब, आगे जो कुछ भी होगा, उसका असर भारतीय बाज़ारों पर दिखेगा और इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभाएंगे कुछ फैक्टर्स, जिसका जिक्र हम कर रहे हैं.

कच्चे तेल का फैक्टर

भारतीय बाज़ारों के लिए कच्चा तेल सबसे बड़े फैक्टर्स में से एक साबित होगा. क्योंकि भारत की कच्चे तेल पर निर्भरता कोई Cyclical समस्या नहीं है, जो आती-जाती रहे. ये हमारी अर्थव्यवस्था की बनावट में ही रची बसी है. हम अपनी जरूरत का लगभग 90% तेल इंपोर्ट करते हैं. इसका मतलब है कि जब भी दुनिया में तेल महंगा होगा, भारत की जेब पर सीधा असर पड़ेगा ही पड़ेगा, इसे हम टाल नहीं सकते.

जब दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तब भारत को उसे खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. इससे डॉलर की डिमांड बढ़ती है और रुपया कमजोर होने लगता है, जैसा कि बीते एक महीने से ज्यादा समय से हम देख रहे हैं. अगर कच्चा तेल महंगा होता है तो इसका सीधा असर रिटेल महंगाई पर पड़ता है. महंगाई बढ़ती है तो ब्याज दरें ऊंची बने रहने का खतरा भी बढ़ता है.

भारत हर दिन करीब 42 लाख बैरल तेल मंगवाता है, अगर 1 बैरल पर सिर्फ 1 डॉलर भी बढ़ा, तो भारत का खर्च हर रोज लाखों डॉलर बढ़ जाता है. इसलिए कच्चा तेल भारत की अर्थव्यवस्था और भारतीय बाज़ार के लिए सबसे बड़े फैक्टर्स में से एक है.

रुपये का फैक्टर

अमेरिका और ईरान की जंग के दौरान भारतीय रुपये ने कई निचले स्तरों को तोड़ा, पहले 92 के पार पहुंचा, फिर 93 के नीचे फिसला, फिर 94 और पिछले हफ्ते इसने 95 का सबसे निचला स्तर भी तोड़ दिया. मगर, इसके बाद रुपये की गिरती साख को बचाने के लिए RBI ने दखल दिया, तो बीते हफ्ते से लेकर अबतक रुपया 2% से ज्यादा मज़बूत हुआ है.

अगर क्रूड भी महंगा हो रहा हो और रुपया भी कमजोर हो, तो ये भारतीय इकोनॉमी के लिए दोहरी मार होती है. ऐसे में बैलेंस करना थोड़ा मुश्किल होता है. क्योंकि एक तो तेल की कीमत हमें ज्यादा देनी है और वो भी डॉलर में, तो जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ेगी. मगर, अब चूंकि कच्चा तेल भी नीचे आया है और रुपया भी डॉलर के मुकाबले मज़बूत हो रहा है, जिससे हमारा इंपोर्ट बिल कम होगा,
इसने सेंटिमेंट्स को पॉजिटिव किया है, जिसका असर हम भारतीय बाज़ारों पर देख रहे हैं, अगर ये समीकरण ऐसा ही बना रहा तो बाज़ार में मज़बूती बनी रहेगी.

GDP ग्रोथ और CAD पर सीधा असर

CAD यानी चालू खाता घाटा, ये सीधे तौर पर कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ा होता है. एक अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है तो भारत का चालू खाता घाटा GDP के 40-50 बेसिस प्वाइंट्स तक बढ़ जाता है और GDP ग्रोथ में 20–25 बेसिस प्वाइंट का धीमापन आ जाता है. ICRA की एक रिपोर्ट बताती है कि अगर FY27 में कच्चे तेल का औसत भाव 100 डॉलर रहा, तो भारत का चालू खाता घाटा बढ़कर GDP का 1.9% से 2.2% तक पहुंच सकता है, जबकि अभी इसके सिर्फ 0.7%-0.8% रहने का अनुमान था.

इस पूरी स्थिति में रिटेल महंगाई में 35-60 बेसिस प्वाइंट्स की बढ़ोतरी हो सकती है. इससे अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त लागत बढ़ता है और रिजर्व बैंक को महंगाई काबू करने के लिए ब्याज दरों को बढ़ाना पड़ सकता है या कम से कम ऊंची दरों पर बनाए रखना होता है, जो किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए सही नहीं है.

क्या होगी FIIs की वापसी?

साल 2026 में FIIs ने अबतक 2.08 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली की है. जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी DIIs ने 2.71 लाख करोड़ रुपये मार्केट में झोंककर स्थिति को संभालने की कोशिश की है. अकेले मार्च में FIIs ने 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बिकवाली की थी, जिसकी सबसे बड़ी वजहें थीं, जंग की वजह से कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतें और कमजोर रुपया.
अब चूंकि 2 हफ्ते के सीज़फायर का ऐलान हुआ है, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही भी हो सकेगी और कच्चा तेल भी अपनी रिकॉर्ड ऊंचाई से गिरकर नीचे आ चुका है और रुपया भी बीते कई सेशन से मज़बूत हुआ है, तो FIIs के मन में भारतीय बाज़ारों को लेकर डर भी खत्म होगा और उनके एक बार फिर से भारतीय बाज़ारों में लौटने की उम्मीद है.

सीज़फायर का किन सेक्टर्स पर असर

सीजफायर के बाद सेंटीमेंट्स बदलने का फायदा किन सेक्टर्स को मिलेगा और किसने नुकसान इसका भी एक छोटा सा एनालिसिस देख लीजिए –

  1. एविएशन (Aviation)
    युद्ध की वजह से इंडिगो (IndiGo) और एयर इंडिया जैसी एयरलाइंस कंपनियां पिछले कुछ समय से दोहरी मार झेल रही थीं. एक ओर से महंगा होता हवाई ईंधन यानी ATF और दूसरी तरफ मिडिल-ईस्ट के ऊपर से उड़ानों का रास्ता बंद होना. अब सीज़फायर की वजह से कच्चे तेल की कीमतें तो 95 डॉलर के नीचे आ गई हैं, जो 116 डॉलर तक पहुंच गईं थी, इससे एयरलाइंस की लागत घटेगी, क्योंकि एयरलाइंस की लागत में ईंधन का हिस्सा सबसे बड़ा होता है. स्पाइसजेट के शेयर में तो 5% का अपर सर्किट भी लगा. इसके अलावा, मिडिल-ईस्ट के ऊपर से गुजरने वाले कई एयरस्पेस प्रतिबंधित कर दिए गए थे, अब ये खुल जाएंगे. जिससे उड़ानें फिर से अपने छोटे और सीधे रूट पर लौट सकेंगी, जिससे ईंधन की भारी बचत होगी. पहले मिडिल-ईस्ट के सबसे बिज़ी एयरपोर्ट्स दुबई, अबू धाबी और दोहा अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद या तो पूरी तरह बंद थे या कड़े प्रतिबंधों के साए में काम कर रहे थे.
  2. तेल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs)
    युद्ध की वजह से कच्चा तेल महंगा हो रहा था, HPCL और BPCL जैसी सरकारी तेल कंपनियां एक अजीब संकट में फंसी थीं, ग्लोबल मार्केट में कच्चा तेल महंगा था, लेकिन वो देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ा रहीं थीं, जिसकी वजह से उनके मार्जिन पर भारी दबाव था. अब कच्चे तेल की कीमतों में कमी आने से इन कंपनियों की अंडर रिकवरी थोड़ी कम होगी जिससे मार्जिन भी सुधरेगा. ये तेल कंपनियों के लिए बड़ी राहत है.
  3. पेंट्स, केमिकल्स और टायर
    इन तीनों सेक्टर्स का कच्चा माल कहीं न कहीं कच्चे तेल के डेरिवेटिव्स से जुड़ा होता है. टायर इंडस्ट्री के लिए कच्चा तेल महंगा होने से टायर बनाने में इस्तेमाल होने वाले ‘कार्बन ब्लैक’ और ‘सिंथेटिक रबर’ की कीमतों में 20% का उछाल आ गया था. तो पेंट इंडस्ट्री ने भी कच्चा तेल महंगा होने की वजह से कीमतें बढ़ाने की चेतावनी दी थी, क्योंकि उनकी भी लागत बढ़ रही थी. अब इनपुट कॉस्ट कम होने से इन कंपनियों को न केवल दाम घटाने में मदद मिलेगी, बल्कि इनकी सेल और मुनाफा दोनों बढ़ेंगे.
  4. फर्टिलाइज़र्स सेक्टर
    आज फर्टिलाइजर कंपनियों के शेयरों में 5% से ज्यादा का उछाल देखने को मिला, क्योंकि सीज़फायर की वजह से सप्लाई में व्यवधान की चिंताएं थोड़ी कम हुईं. चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फर्टिलाइजर उपभोक्ता है. भारत कच्चे माल और तैयार उर्वरकों दोनों के इंपोर्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर है. इनमें से ज्यादातर इंपोर्ट मिडिल ईस्ट से होता है. जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरता है, हाल के संघर्ष के कारण इस रूट पर शिपिंग में रुकावट आई थी, लेकिन अब सीज़फायर के बाद ये रुकावट खत्म हुई है. हालांकि सीज़फायर के बावजूद, वहां की सप्लाई चेन को पूरी तरह सामान्य होने में समय लग सकता है.

दो हफ्ते का सीज़फायर दो हफ्ते चलेगा या ट्रंप इसे बीच में ही तोड़ देंगे, जैसा कि ट्रंप हमेशा करते आए हैं. उनके फैसले प्रति घंटे के हिसाब से बदल जाते हैं, इस बार भी अगर ऐसा हुआ तो बाज़ार के लिए घातक होगा. मगर, दो हफ्ते सीज़फायर चला और युद्ध खत्म करने पर कोई सहमति बनती है तो दुनिया भर के बाज़ारों के लिए बड़ी राहत होगी.

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए लिखा गया है। इसमें जिन शेयरों और कंपनियों का जिक्र किया गया है, वे उनके पिछले प्रदर्शन और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित हैं। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन होता है और पिछले रिटर्न भविष्य की गारंटी नहीं होते। निवेश से पहले निवेशकों को अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लेनी चाहिए या खुद स्वतंत्र रिसर्च करनी चाहिए। लेखक किसी भी तरह के लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।

Twitter – https://x.com/SumitResearch

Insta – Mehrotra Sumit (@sumitresearch)

Youtube – https://www.youtube.com/@Sumitresearch

Facebook – https://www.facebook.com/sumitresearch/

Blog – https://sumitresearch.com/

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *