नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) की ओनरशिप में गिरावट आई है. NSE की एक रिपोर्ट के मुताबिक NSE में लिस्टेड कंपनियों में FPI की ओनरशिप दिसंबर 2025 को खत्म तिमाही में घटकर 16.7% रह गई है. इसका मतलब है कि इस अवधि में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में अपनी भागीदारी कम की है.
साल 2025 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का आउटफ्लो 18.9 बिलियन डॉलर रहा है, यानी विदेशी निवेशकों ने इतने पैसे बाजार से निकाल लिए, जिसकी वजह से उनकी ओनरशिप 15.5 साल के निचले स्तर 16.7% पर पहुंच गई. इंडेक्स में NSE Nifty50 में FPI की हिस्सेदारी तिमाही आधार पर 25 बेसिस प्वाइंट घटकर 23.8% रह गई, जो 13 साल से ज्यादा का निचला स्तर है. हालांकि Nifty 500 में उनकी हिस्सेदारी में ज्यादा कुछ बदलाव नहीं देखने को मिला ये 18.1% पर बनी रही. यह संकेत देता है कि विदेशी निवेशकों ने खासतौर पर बड़ी कंपनियों में अपनी पकड़ ढीली की है, जबकि ब्रॉडर मार्केट में उनका नजरिया बैलेंस रहा है.

क्यों आ रही है गिरावट
NSE की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछली 11 तिमाहियों में से केवल दो तिमाहियों में मामूली बढ़त को छोड़ दें तो मार्च 2023 के बाद से NSE में लिस्टेड कंपनियों में FPI की हिस्सेदारी लगातार गिरावट के रुख में रही है. ये ट्रेंड बताता है कि विदेशी कैश इनफ्लो में अस्थिरता बढ़ी है और ग्लोबल निवेशकों का भरोसा उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहा है. लगातार घटती हिस्सेदारी इस बात का संकेत है कि ग्लोबल मार्केट्स के हालात जैसे कि इंटरेस्ट रेट में बदलाव, जियो पॉलिटिकल टेंशन और ग्लोबल फाइनेंशियल उथल-पुथल भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेश के फैसलों पर असर डाल रही हैं.
भले ही FPI का प्रतिशत हिस्सा गिर रहा हो, लेकिन बाजार के कुल वैल्यू में बढ़ोतरी की वजह से उनकी होल्डिंग्स की रुपये में वैल्यू बढ़ी है. वैल्यू के हिसाब से NSE की लिस्टेड कंपनियों में FPI की होल्डिंग्स दिसंबर 2025 के अंत तक तिमाही दर तिमाही 4.6% बढ़कर 78.7 लाख करोड़ रुपये हो गई. हालांकि FPIs की ओनरशिप प्रतिशत पहले के मुकाबले कम हुई है, लेकिन उनकी कुल निवेश रकम की वैल्यू सालाना आधार पर लगभग 16.5% की दर से बढ़ी है, जो मार्केट की 15.8% ग्रोथ रेट से थोड़ा तेज है. आसान तरीके से समझें तो ये है कि यह दिखाता है कि बाजार ऊपर गया है, इसलिए कम प्रतिशत होने पर भी वैल्यू बढ़ी है.
FPIs के मन में क्या है?
FPIs ने फाइनेंशियल सेक्टर में अपनी ओवरवेट पोजीशन जारी रखा है, लेकिन पहले जितना मजबूत नहीं रहा. मतलब ये कि वो अब भी बैंकिंग, NBFC और इंश्योरेंस जैसे शेयरों में निवेश करना पसंद करते हैं, लेकिन दिचलस्पी थोड़ी कम हुई है. मगर, उन्होंने कम्युनिकेशन सर्विसेज सेक्टर में जैसे कि जैसे टेलीकॉम, मीडिया, इंटरनेट कंपनियां, यहां पर अपनी पसंद काफी बढ़ा दी है.
दूसरी ओर, FPIs ने कंजम्पशन और कमोडिटी से जुड़े सेक्टर्स जैसे कंज्यूमर स्टेपल्स, मैटेरियल्स और बड़े-कैप एनर्जी स्टॉक्स पर सतर्कता बरती हुई है, यानी यहां पर वो लगातार इंडरवेट बने हुए हैं, यानी इन सेक्टर्स में कम पैसा डाल रहे हैं.
इंडस्ट्रियल्स सेक्टर्स जैसे कि इंजीनियरिंग, कैपिटल गुड्स पर उनका नजरिया थोड़ा कम नेगेटिव हुआ है, लेकिन कुल मिलाकर अभी भी अंडरवेट ही है. बाकी सेक्टरों जैसे कंज्यूमर डिस्क्रेशनरी ऑटो, लग्जरी वगैरह, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT), यूटिलिटीज और हेल्थकेयर में FPIs ने ज्यादातर न्यूट्रल पोजीशन बनाए रखी है. कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट दिखाती है कि FPIs अब बड़े और स्थिर सेक्टर्स जैसे कि फाइनेंशियल्स, कम्युनिकेशन में ज्यादा दिचलस्पी दिखा रहे हैं, जबकि साइक्लिकल या कमोडिटी वाले सेक्टरों से दूरी बना रहे हैं.
Desi Boys का बढ़ा दबदबा
इधर, घरेलू संस्थागत निवेशकों ने पहली बार Nifty50 में FIIs को ओवरटेक किया है. दिसंबर 2025 तिमाही के अंत में DIIs का Nifty50 में ओनरशिप 24.8% हो गया, जो FIIs के 23.8% से थोड़ी ज्यादा है. ये निफ्टी Nifty50 में DIIs की पहली बार बढ़त है. आनंदराठी का कहना है कि यह बदलाव स्थायी है, न कि अस्थायी. पहले DIIs ने कुल इक्विटी में FIIs को पीछे छोड़ा था, लेकिन Nifty50 में अब पहली बार ऐसा हुआ है. मजबूत SIP इनफ्लो और घरेलू इकोसिस्टम की वजह से DIIs मजबूत हुए हैं.
2025 में SIP इनफ्लो 3.34 लाख करोड़ रुपये रहा है, पेंशन फंड्स की इक्विटी में बढ़ती भागीदारी और नए एसेट मैनेजमेंट कंपनियों के लॉन्च ने DIIs मजबूत हुए हैं. जबकि FIIs लगातार बिकवाली कर रहे हैं, उसकी कई वजहे हैं. FIIs ने रुपए की कमजोरी और ग्लोबल मार्केट्स में बेहतर रिटर्न की वजह से भारतीय बाजारों में अपना एक्सपोजर कम किया. पिछले 5 सालों में FIIs ने कुल 9.96 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली की, लेकिन बाजार फिर भी मजबूत रहा. क्योंकि DIIs की खरीदारी ने बाजार को सपोर्ट किया. एक डेटा के मुताबिक – DIIs ने 82% कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाई, जबकि FIIs ने 78% में कम की, जिससे निफ्टी ने पिछले 5 सालों में 72-75% का अब्सोल्यूट रिटर्न दिया.
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए लिखा गया है। इसमें जिन शेयरों और कंपनियों का जिक्र किया गया है, वे उनके पिछले प्रदर्शन और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित हैं। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन होता है और पिछले रिटर्न भविष्य की गारंटी नहीं होते। निवेश से पहले निवेशकों को अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लेनी चाहिए या खुद स्वतंत्र रिसर्च करनी चाहिए। लेखक किसी भी तरह के लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।
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