ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के हमले से पूरा मिडिल ईस्ट बेहद तनाव के दौर से गुज़र रहा है. दोनों तरफ से अब खुली जंग हो ही है, दोनों ने ही अब किसी सीमा तक जाकर लड़ाई शुरू कर दी है. ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो चुकी है और भी ईरान के कई बड़े लीडर्स इस जंग में मारे जा चुके हैं. अगर ये जंग लंबे समय तक चली तो स्थितियां और बदतर हो सकती हैं. इस बीच जो सबसे परेशान करने वाली खबर है वो ये कि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को बंद कर दिया है. इस रास्ते से दुनिया का करीब 20% और भारत का 40% से ज्यादा कच्चा तेल होकर गुजरता है. शिपिंग में बहुत दिक्कतें आना शुरू हो चुकी हैं, क्योंकि ईरन ने जहाजों को रोक दिया है.
इन सभी घटनाक्रमों का कच्चे तेल की कीमतों पर कितना असर पड़ेगा, भारत पर इसका क्या असर होगा, भारत के शेयर बाज़ार पर इसका क्या असर होगा, कौन-कौन से सेक्टर्स हैं जो इससे प्रभावित होंगे. JM फाइनेंशियल ने एक रिपोर्ट जारी की है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से तेल की कीमतों पर क्या असर होगा?
ईरान पर हमलों की वजह से ब्रेंट क्रूड की कीमत 82 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी है. अब देखिए अलग अलग हालातों में क्रूड की कीमतों पर क्या असर पड़ेगा, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है.
- अगर ईरान सिर्फ छोटा-मोटा जवाब देता, तो कीमतें 5 से 10 डॉलर तक ही बढ़तीं
- अगर ईरान के तेल के इंफ्रा या पाइपलाइन को सीधा नुकसान पहुंचेगा तो 10 से 12 डॉलर तक कीमत बढ़ेगी
- अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में जहाज़ों की आवाजाही पूरी तरह रुके या बहुत कम हो जाए तो कीमत 90 डॉलर से ऊपर चली जाएगी
- अगर पूरा मिडिल ईस्ट जंग में झोंक दिया जाए तो तेल की कीमत 100 डॉलर से भी ज्यादा हो सकती है

भारत पर इसका क्या असर होगा?
भारत अपनी ज़रूरत का 85% से ज्यादा क्रूड ऑयल इंपोर्ट करता है, ये इसके इंपोर्ट का एक बहुत बड़ा हिस्सा है. यानी क्रूड के दाम बढ़ने पर भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ेगा, जो कि इसकी इकोनॉमी के लिए अच्छा नहीं है. रिपोर्ट में बताया गया है कि कच्चे तेल में हर 1 डॉलर बढ़ने पर भारत का सालाना तेल इंपोर्ट बिल करीब 2 बिलियन डॉलर या करीब 16-17 हजार करोड़ रुपये बढ़ जाता है.
अब उस हालात की कल्पना कीजिए कि अगर तनाव लंबा चला तो क्या होगा –
जहाज़ चलाने और समुद्री बीमा का खर्च बढ़ेगा, गल्फ के जहाज़ों के रास्तों में रुकावटें आएंगी इससे ट्रेड बैलेंस पर दबाव पड़ेगा. साथ ही अगर, भारतीय रुपया कुछ समय के लिए कमजोरी की तरफ झुक सकता है, RBI अपने फॉरेक्स रिज़र्व से इसको संभालने की कोशिश कर सकता है.
अब इसका असर लोगों पर किस तरह से आएगा, ये भी देखिए- कच्चा तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ता है, चीजें महंगी होना शुरू हो जाएंगी. महंगाई बढ़ने से बॉन्ड यील्ड ऊपर जाती हैं और यील्ड बढ़ने से शेयर बाजार में कंपनियों की वैल्युएशन कम हो जाती है. मोटा मोटा ये समझ लीजिए कि तेल की कीमतें बढ़ीं तो महंगाई बढ़ेगी, रुपया कमजोर होगा, और शेयर बाजार पर भी बुरा असर पड़ेगा.
किन सेक्टर्स पर पड़ेगा असर
इन सब घटनाक्रमों के बीच भारतीय बाजार अनुमानों के मुताबिक गिरावट के साथ खुले हैं. रिपोर्ट दावा करती है कि ग्लोबल स्तर पर डर का माहौल है, इसलिए बाजार में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव रहेगा. इस माहौल में ज्यादातर कंपनियों पर निगेटिव असर होगा, लेकिन कुछ कंपनियां हैं जिन्हें इस तनावपूर्ण स्थिति का फायदा मिलने की भी उम्मीद है. ऑयल मार्केटिंग कंपनियां जैसे IOC, BPCL, HPCL, पेंट कंपनियां, टायर कंपनिया, एविएशन कंपनियां और केमिकल कंपनिया लागत बढ़ने की वजह से अपने मुनाफे पर दबाव महसूस करेंगी.
मगर दूसरी तरफ, अपस्ट्रीम ऑयल कंपनियां यानी की जो तेल निकालती हैं, जैसे ONGC और Oil India इनको फायदा होगा. क्योंकि क्रूड के दाम बढ़ेंगे तो इनको ज्यादा पैसे मिलेंगे. साथ ही, डिफेंस कंपनियां जैसे HAL और BEL को भी फायदा होगा, क्योंकि जंग में हमेश डिफेंस कंपनियों की डिमांड बढ़ जाती है. इनके लिए जंग जैसे हालात पॉजिटिव सेंटीमेंट्स पैदा करते हैं. इनको हथियारों के नए ऑर्डर्स मिल सकते हैं.

तो अभी नजर कहां रखनी है?
अभी जो हालात हैं, उसे देखकर लगता नहीं है कि युद्ध जल्द खत्म होगा. इसलिए नजर इस बात पर रखनी है कि क्रूड ऑयल 80 डॉलर के ऊपर टिकता है या नहीं. दूसरा, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में शिपिंग रूट कितनें दिनों के लिए बाधित रहता है. मोटा-मोटा ये समझ लीजिए कि अभी भारतीय शेयर बाजार के लिए कच्चा तेल सबसे बड़ा फैक्टर बन गया है.
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए लिखा गया है। इसमें जिन शेयरों और कंपनियों का जिक्र किया गया है, वे उनके पिछले प्रदर्शन और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित हैं। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन होता है और पिछले रिटर्न भविष्य की गारंटी नहीं होते। निवेश से पहले निवेशकों को अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लेनी चाहिए या खुद स्वतंत्र रिसर्च करनी चाहिए। लेखक किसी भी तरह के लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।
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