बाज़ार में इस वक्त बहुत शोर है! जियो-पॉलिटिकल टेंशन, क्रूड बेतहाशा ऊपर-नीचे होना, विदेशी निवेशकों की बिकवाली, सोने को लेकर कंफ्यूजन. बाज़ार इस शोर-गुल के बीच गोते ही लगा रहा है. पोर्टफोलियो हल्के होते जा रहे हैं, समझ नहीं आ रहा, ये गिरावट कहां जाकर रुकेगी.
ऐसे में कोई एक चीज़, जो इस शोरगुल से दूर हो, जहां पर चुपचाप थोड़ा बहुत रिटर्न मिलता रहे, तो क्या बुरा है. वो है कंपनियों की ओर से दिया जाना वाला डिविडेंड. जहां कम से कम निवेशकों को 4-6% तक महंगाई से एडजस्टेड रिटर्न तो मिल जाता है. ऐसी ही 12 कंपनियों के बारे में बता रहे हैं, जो आपको सुकून भरा पैसिव इनकम जेनरेट करके देती हैं.
डिविडेंड क्या होता है?
डिविडेंड कंपनी के प्रॉफिट का वो हिस्सा होता है जो कंपनी अपने शेयरहोल्डर्स को बांटती है. डिविडेंड आमतौर पर कैश में दिया जाता है, लेकिन कभी-कभी स्टॉक या दूससे एसेट के रूप में भी मिलता है. देश में कई कंपनियां हैं जो अपने निवेशकों को रेगुलर डिविडेंड देती हैं. जैसे कि Coal India, ITC, Hindustan Zinc रेगुलर डिविडेंड देने के लिए जानी जाती हैं.
मान लीजिए आपके पास किसी कंपनी ABC के 100 शेयर हैं.
कंपनी ने प्रति शेयर 10 रुपये का डिविडेंड घोषित किया
तो आपको कुल 1,000 रुपये (100 × 10) का डिविडेंड मिलेगा
यह पैसा सीधे आपके बैंक अकाउंट में आ जाता है.
डिविडेंड अच्छा इसलिए भी होता है क्योंकि जब बाजार गिरता है तब भी डिविडेंड निवेशकों को कुछ रिटर्न देता रहता है. जैसा कि इस वक्त हो रहा है. साथ ही, अगर डिविडेंड को फिर से निवेश किया जाए तो लंबे समय में कंपाउंडिंग से बड़ा रिटर्न मिल सकता है.
डिविडेंड यील्ड क्या होता है?
डिविडेंड समझ आ गया तो अब डिविडेंड यील्ड भी जान लीजिए, इसका मतलब होता है कि कोई कंपनी अपने शेयर की मौजूदा मार्केट प्राइस के मुकाबले हर साल कितना डिविडेंड दे रही है, ये एक बहुत जरूरी फाइनेंशियल रेश्यो होता है. ये उन निवेशकों के लिए काफी अच्छा माना जाता है, जो कि रेगुलर पैसिव इनकम चाहते हैं. आपको बिना शेयर बेचे ही इनकम होती रहती है. डिविडेंड तिमाही, छमाही या सालाना आधार पर दिया जा सकता है, ये कंपनी पर निर्भर करती है कि वो कब देना चाहती है.
तर्कसंगत डिविडेंड यील्ड क्या होता है?
इसका मतलब ये नहीं है कि डिविडेंड यील्ड ज्यादा है तो बहुत अच्छा है. क्योंकि शेयर प्राइस बढ़ने पर यील्ड कम हो जाती है और शेयर प्राइस घटने पर ज्यादा. इसको उदाहरण से समझिए-
मान लीजिए यही कंपनी ABC प्रति शेयर 10 रुपये का सालाना डिविडेंड देती है.
शेयर की मौजूदा कीमत 200 रुपये है, तो यील्ड = (10 ÷ 200) × 100 = 5%
यानी अगर आप 200 रुपये में शेयर खरीदते हैं, तो हर साल आपको डिविडेंड से 5% रिटर्न मिलने की उम्मीद है.
अब मान लीजिए कि शेयर प्राइस गिरकर 100 रुपये हो जाता है, तो यील्ड = (10 ÷ 100) × 100 = 10%
देखिए यील्ड तो बढ़कर 10% हो गई, लेकिन शेयर प्राइस भी गिरकर 100 रुपये हो गया.अब ऐसे में जब कंपनी का शेयर प्राइस गिर रहा है, तो कंपनी मुश्किल में हो सकती है, हो सकता है वो डिविडेंड देना बंद भी कर दे या उसमें कटौती कर दे. इसलिए जरूरी है कि डिविडेंड यील्ड तर्कसंगत (Reasonable) होना चाहिए. ऐसे में हम मानते हैं कि 4-6% तक का डिविडेंड यील्ड तर्कसंगत होता है. ये टिकाऊ और स्वस्थ माना जाता है.
4-6% यील्ड वाली कंपनियां आमतौर पर मजबूत कैश फ्लो वाली कंपनियां होती हैं. इनका पेआउट रेशियो यानी कि कितना प्रॉफिट डिविडेंड में देते हैं, ये 30-60% के बीच रहता है. कंपनी के पास ग्रोथ के लिए भी पैसा बचता है, और डिविडेंड कटने का रिस्क कम होता है. अगर यील्ड 8-10%+ हो जाए, तो अक्सर पेआउट रेश्यो 80-100%+ होता है, मतलब ये कि कंपनी लगभग सारा प्रॉफिट डिविडेंड में दे रही है, अगर शेयर में गिरावट आ जाए तो डिविडेंड में भी कटौती होगी. इसलिए 4-6% यील्ड को एकदम तर्कसंगत माना जाता है, अगर शेयर प्राइस में गिरावट आ भी जाए तो डिविडेंड चालू रह सकता है.

TCS ऐसी कंपनी जो अपने शेयरहोल्डर्स को तगड़ा डिविडेंड देने के लिए जानी जाती है. TCS का FY25 में डिविडेंड पेआउट 44,962 करोड़ रुपये रहा था. इसके पहले FY23 में 33,306 करोड़ रुपये और 2020 में 25,125 करोड़ रुपये का डिविडेंड दिया था. कोल इंडिया भी उन कंपनियों में शुमार है जो डिविडेंड देने के लिए जानी जाती है. इसने FY25 में करीब 26,000 करोड़ रुपये का डिविडेंड दिया था, जो कि प्रति शेयर करीब 26.5 रुपये पड़ता है. कोल इंडिया पिछले सालों में सबसे ज्यादा कुल डिविडेंड देने वाली कंपनी है. इसके अलावा भी कई कंपनियां हैं शेयरहोल्डर्स को रेगुलर डिविडेंड देती हैं.
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए लिखा गया है। इसमें जिन शेयरों और कंपनियों का जिक्र किया गया है, वे उनके पिछले प्रदर्शन और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित हैं। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन होता है और पिछले रिटर्न भविष्य की गारंटी नहीं होते। निवेश से पहले निवेशकों को अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लेनी चाहिए या खुद स्वतंत्र रिसर्च करनी चाहिए। लेखक किसी भी तरह के लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।
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