दुनिया जंग से पस्त, सोना सोने में मस्त! क्या है सुस्ती की वजह; क्या आगे भी ऐसा ही चलेगा?

Gold’s muted reaction to the Iran conflict and what it means for investors

जब दुनिया में जंग चल रही है, तो सोना क्यों नहीं चढ़ रहा? दुनिया में जंग छिड़ी हो और गोल्ड न चढ़े, यह बाजार के पुराने नियमों के खिलाफ लगता है. आम तौर पर माना जाता है कि गोल्ड जियो-पॉलिटिकल अनिश्चितता के खिलाफ एक तरह का ‘इंश्योरेंस’ होता है, कहने का मतलब ये कि जब दुनिया में तनाव या जंग का खतरा बढ़ता है, तो लोग गोल्ड की तरफ भागते हैं, मगर इस बार गंगा उल्टी क्यों बह रही है.

गोल्ड की उल्टी चाल

28 फरवरी को जब अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर स्ट्राइक शुरू की, तो ग्लोबल मार्केट में गोल्ड का भाव 5,296 डॉलर से बढ़कर 2 मार्च, 2026 को भाव 5,423 डॉलर प्रति आउंस तक पहुंचा. यह उसी पुराने नियम जैसा था कि जियोपॉलिटिकल तनाव बढ़ता है तो निवेशक सेफ-हेवन एसेट्स जैसे गोल्ड की तरफ जाते हैं. लेकिन उसके तुरंत बाद बाजार में सेल-ऑफ आया और 3 मार्च तक गोल्ड की कीमत 6% से ज्यादा गिरकर 5,085 डॉलर तक आ गईं.

इसके पहले, पिछले साल ईरान के साथ 12 दिन की जंग के दौरान गोल्ड की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं, लेकिन जैसे ही सीज़फायर का ऐलान हुआ, गोल्ड ने अपनी ज़्यादातर बढ़त गंवा दी, इस बार हालात थोड़े अलग हैं. ईरान, इज़रायल और अमेरिकी के बीच चल रही जंग को दो हफ्ते हो चुके हैं, लेकिन गोल्ड की कीमतों में बड़ा मूवमेंट नहीं दिख रहा. मिडिल ईस्ट में लगातार तनाव के बावजूद, ग्लोबल मार्केट में सोने का वायदा शुक्रवार को 1.25% टूटकर 5,061.70 डॉलर प्रति आउंस पर बंद हुआ.

सिर्फ स्पॉट गोल्ड ही नहीं, गोल्ड से जुड़े ETF भी दबाव में हैं, गोल्ड और माइनिंग कंपनियों को ट्रैक करने वाले फंड, जैसे SPDR Gold Trust (GLD) और VanEck Gold Miners ETF (GDX) भी इस हफ्ते गिरावट में बंद होने की तरफ बढ़ रहे हैं. SPDR Gold Trust तो पिछले हफ्ते 1.50% तक टूटा, जबकि VanEck Gold Miners ETF पिछले हफ्ते 6% से ज्यादा नीचे फिसल गया. मार्केट एक्सपर्ट्स कहते हैं कि इसके पीछे कई वजहें हैं कि जो एसेट आमतौर पर सेफ हेवन माना जाता है, वह इस बार उम्मीद के मुताबिक परफॉर्म नहीं कर रहा है.

पहली वजह: डॉलर की मज़बूती

Metals Daily के CEO रॉस नॉर्मन बताते हैं कि गोल्ड में तेज़ी न आने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं, इनमें सबसे बड़ी वजह है मजबूत होता डॉलर और अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड की बढ़ती यील्ड. क्योंकि आम तौर पर जब डॉलर मजबूत होता है, तो गोल्ड की कीमतों पर दबाव आता है, क्योंकि दुनिया के बाकी निवेशकों के लिए गोल्ड खरीदना महंगा हो जाता है, गोल्ड की मांग में कमी आती है.

हालांकि, गोल्ड में भरोसा रखने वाले निवेशक अब भी मानते हैं कि यह गिरावट ज्यादा लंबी नहीं चलेगी. World Gold Council की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, “मौजूदा संघर्ष की वजह से डॉलर में जो उछाल आया है, वह शायद ज्यादा समय तक नहीं टिकेगा. अगर डॉलर फिर कमजोर होता है, तो यह गोल्ड के लिए सपोर्टिव साबित हो सकता है.”

दूसरी वजह: तेल की बढ़ती कीमतें

नॉर्मन कहते हैं कि तेल की बढ़ती कीमतें भी एक बड़ा फैक्टर हैं. अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जो तेल और गैस के लिए बेहद अहम समुद्री रास्ता है, यहां पर कोई भी रुकावट आती है, तो इससे महंगाई लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती है. ऐसे में सेंट्रल बैंक शायद ब्याज दरें ज्यादा समय तक ऊंची रखें. जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो सरकारी बॉन्ड जैसे यील्ड देने वाले एसेट्स ज्यादा आकर्षक लगने लगते हैं, जबकि गोल्ड जैसे एसेट्स कोई ब्याज नहीं देते, इनकी डिमांड गिर जाती है.

नॉर्मन कहते हैं कि फिलहाल गोल्ड और सिल्वर की कीमतों की चाल थोड़ी सुस्त लग सकती है, लेकिन पिछले कुछ महीनों में जो बड़ी तेजी आई थी, उसके बाद ऐसा होना शायद बहुत ज्यादा असामान्य भी नहीं है. उनका मानना है कि कुछ संस्थागत निवेशक अभी गोल्ड को रखने को लेकर थोड़ा नर्वस हो गए हैं, क्योंकि हाल के समय में बुलियन की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है.

तीसरी वजह: लोगों ने पहले ही खरीद लिया सोना

कई एनालिस्ट ये भी मानते हैं कि पिछले करीब 12 महीनों में निवेशकों ने गोल्ड को पहले ही काफी ज्यादा मात्रा में खरीदकर अपने पास लिया था, यानी कई लोगों के लिए यह अब सिर्फ सेफ-हेवन नहीं बल्कि एक मोमेंटम ट्रेड बन गया था, जहां लोग तेजी देखकर खरीदते चले गए.

चौथी वजह: पैनिक सेलिंग

एक और वजह यह हो सकती है कि जब किसी इलाके में संघर्ष शुरू होता है, तो मार्केट में अक्सर घबराहट में बिकवाली शुरू हो जाती है. Al Ramz के रिसर्च हेड आमेर हलावी के मुताबिक, ऐसे समय में कई बार ऐसा तेज़ बिकवाली का दौर आता है, जिसमें कीमतें गिरने लगती हैं और ट्रेडर्स अपनी पोज़िशन बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं. अगर लिक्विडिटी की दिक्कत आ जाए, तो शुरुआत में लगभग हर एसेट बिकने लगता है, जब तक निवेशक हालात को समझकर फिर से सही एसेट्स की तरफ फोकस न करने लगें. इसके पहले भी ऐसा हो चुका है किसी बड़े झटके के बाद गोल्ड पहले गिरता है और फिर बाद में संभलकर ऊपर जाता है. हालांकि, शॉर्ट टर्म उतार-चढ़ाव के बावजूद बड़े बैंकों का नजरिया अभी भी पॉजिटिव है.

आगे क्या होगा गोल्ड का?

इन सबके बावजूद बैंकों का गोल्ड पर भरोसा बरकरार है, जे पी मॉर्गन का अनुमान है कि 2026 के आखिर तक गोल्ड 6,300 डॉलर प्रति आउंस तक पहुंच सकता है, जे पी मॉर्गन की ग्लोबल मार्केट्स स्ट्रैटेजी टीम का मानना है कि भीड़ वाली ट्रेड्स अब थोड़ा खुल रही हैं, यानी निवेशक मुनाफा बुक कर रहे हैं. यह ट्रेंड सिल्वर में गोल्ड के मुकाबले ज्यादा साफ दिख रहा है. Deutsche Bank ने अपने हालिया नोट में साल के अंत तक 6,000 डॉलर का टारगेट रखा है.

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए लिखा गया है. इसमें जिन शेयरों, कमोडिटीज का जिक्र किया गया है, वे उनके पिछले प्रदर्शन और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित हैं. शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन होता है और पिछले रिटर्न भविष्य की गारंटी नहीं होते. निवेश से पहले निवेशकों को अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लेनी चाहिए या खुद स्वतंत्र रिसर्च करनी चाहिए. लेखक किसी भी तरह के लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे.

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