ईरान, इज़रायल और अमेरिका की जंग को 2 हफ्तों से ज्यादा हो चुके हैं, और कहीं से भी इस बात के संकेत नहीं मिल रहे हैं कि ये युद्ध जल्द खत्म होगा. हवाई हमलों के अलावा दावों और बयानबाज़ियों का युद्ध भी अलग से चल रहा है, दोनों पक्षों के अपनी जीत के दावे हैं, लेकिन हकीकत क्या है, कोई नहीं जानता है. तो क्या ये युद्ध भी रूस और यूक्रेन की तरह लंबा खिंचेगा, अगर ऐसा हुआ तो इसका दुनिया और भारत की इकोनॉमी पर क्या असर होगा.
इस पर Kotak NDPMS का एक छोटा सा नोट है, जिसमें ग्लोबल जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स कॉल के बाद कुछ मुख्य बिंदुओं के बारे में बताया गया है. Kotak NDPMS के इस नोट का टॉपिक है – Are we in for a long drawn middle east conflict? यानी मिडिल ईस्ट का संकट एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है, क्या हम एक लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जो ग्लोबल इकोनॉमी और फाइनेंशियल मार्केट्स को पूरी तरह से नया आकार दे सकता है?
जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स से चर्चा के बाद ये नतीजा निकला कि लंबे समय तक चलने वाले बड़े संघर्ष का खतरा सच में मौजूद है. इसकी वजह बहुत आसान है, न तो अमेरिका-इज़रायल पक्ष को पूरी जीत का साफ रास्ता दिख रहा है और न ही ईरान को. दोनों पक्षों के लिए जीत के मायने बिल्कुल ही अलग है.
अमेरिका के पास साफ जीत का प्लान नहीं है
ईरान के साथ जंग में अमेरिका के लिए जीत का क्या मतलब है, वो किस बात को कहेगा कि ये उसकी जीत है और अब जंग खत्म है.यही सबसे बड़ी समस्या है कि अमेरिका ने जीत का मतलब अभी तक साफ ही नहीं किया है. क्या सत्ता परिवर्तन उसकी जीत है, या ऑयल रिज़र्व पर कब्ज़ा उसकी जीत है, परमाणु हथियार जिसका दावा अमेरिका ने किया है, उसे खत्म करना उसकी जीत है. सबकुछ बस अस्पष्ट है. इसलिए जब लक्ष्य ही तय नहीं है तो युद्ध जल्दी कैसे खत्म होगा, इतिहास बताता है कि बिना साफ मकसद के युद्ध सालों चलते रहते हैं.
ईरान की रणनीति बिल्कुल साफ है, बस टिके रहना है
अमेरिका के ठीक उलट, ईरान की रणनीति बहुत सीधी और यथार्थवादी है, उसे इस जंग में बस टिके रहना है, उसकी सरकार बनी रहे, अमेरिका उस पर कब्ज़ा न कर ले, यही उसकी जीत है.
ईरान में अगर इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) काम करता रहे, और देश टूटे-बिखरे नहीं, तो उन्हें अमेरिका को सैन्य रूप से हराने की ज़रूरत नहीं, बस दबाव झेलकर टिक जाना काफी है. अगर ईरान अमेरिका जैसे एक सुपरपावर के हमलों को झेलकर भी खड़ा रहता है, तो घरेलू स्तर पर इसे बड़ी जीत के रूप में पेश किया जा सकता है. वो अपनी जनता से ये कह सकता है कि ‘हमने अमेरिका का मुकाबला किया और बच गए’. दोनों के लक्ष्यों में इतना बड़ा अंतर होने से संघर्ष सुलझाना मुश्किल हो जाता है, एक तरफ पूरी जीत की चाहत है, दूसरी तरफ सिर्फ जिंदगी बचाए रखना और टिके रहना ही जीत है, ऐसे में ये टकराव लंबा खिंच सकता है.
ट्रंप के लिए बड़ी राजनीतिक दुविधा
नोट में कहा गया है कि अमेरिका राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के लिए ये स्थिति एक बड़ी राजनीतिक दुविधा बन गई है. ट्रंप ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ की छवि बना रखी है, उनके समर्थक लंबे विदेशी युद्धों के सख्त खिलाफ हैं. खुद ट्रंप भी यही कहकर राष्ट्रपति चुनावों में उतरे थे कि वो बेवजह के विदेशी युद्धों में नहीं पड़ेंगे और अमेरिका को फिर से महान बनाने की दिशा में काम करेंगे. क्योंकि अमेरिका जनता इसके पहले अफगानिस्तान और इराक जैसे संघर्षों से गुजर चुकी है, हज़ारों सैनिकों की मौत और उस तनाव को जनता अब और नहीं सहन करना चाहेगी. इसलिए कोई भी नया लंबा युद्ध उनके वोट बैंक को नाराज कर सकता है. दूसरी तरफ, अगर अमेरिका बिना कोई साफ नतीजा निकाले पीछे हट जाए, तो ट्रंप को कमजोर दिखने का खतरा है. राष्ट्रीय सुरक्षा पर मजबूत दिखना उनकी राजनीति के लिए बहुत जरूरी है, खासकर चुनावों और मीडिया की नजर में. इस वजह से वो एक उलझन में फंस गए हैं. ज्यादा देर तक लड़ते रहने से वोटर नाराज होंगे, और जल्दी छोड़ने से कमजोर लगेंगे.
ईरान की सस्ता, सुंदर, टिकाऊ रणनीति
ईरान जानता है कि वो सैन्य ताकत के मामले में, टेक्नोलॉजी या फिर खर्चे में मामले में सीधी टक्कर नहीं ले सकता है, इन सबमें अमेरिका कहीं बड़ा और आगे है. इसलिए उसने एक तरकीब सोची. कम खर्चे में ज्यादा असर वाली लड़ाई. वो सीधे लड़ाई की बजाय छोटे-छोटे लेकिन प्रभावी हमले करता है, जैसे सस्ते ड्रोन और मिसाइलों से शिपिंग के मुश्किलें पैदा करना. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी करना और ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से रोज दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है. यहां थोड़ी सी भी रुकावट तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा देती है. इसको ऐसे समझिए कि ईरान 100 रुपये की गुलेल से वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए 10,000 रुपये का नुकसान पैदा कर सकता है. चोक पॉइंट्स और सप्लाई चेन को निशाना बनाकर वो पूरी दुनिया में आर्थिक तनाव फैला देता है, बिना ज्यादा खर्च किए.
अमेरिका की साख दांव पर लगी
गल्फ में अमेरिका की साख भी इस टकराव से दांव पर लगी हुई है, अगर अमेरिका जरूरी समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाता या अपने मिडिल ईस्ट के सहयोगियों जैसे सऊदी अरब और UAE को सुरक्षा देने में कमजोर दिखता है, तो उसकी उस छवि को नुकसान पहुंच सकता है, जिसमें उसे लंबे समय से ‘गल्फ पुलिसमैन’ माना जाता रहा है. ऐसी स्थिति में खाड़ी देश BRICS जैसे समूहों के साथ जुड़ने की भी सोच सकते हैं, जो ट्रंप के लिए बहुत बड़ा झटका हो सकता है, क्योंकि BRICS को लेकर ट्रंप के सुविचार पूरी दुनिया को पता हैं. हालांकि ऐसा होना काफी मुश्किल है. क्योंकि इन देशों की अर्थव्यवस्था, हथियार खरीद और सुरक्षा अभी भी काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर है.
डिस्क्लेमर: ये आर्टिकल Kotak NDPMS के नोट में दिए गए बिंदुओं से लिखा गया है. इसमें लेखक के अपने कोई विचार नहीं है.
















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