जॉब्स, AI, किसान और सब्सिडी…बर्न्सटीन ने बताईं देश की 8 दुखती नब्ज़, PM मोदी को लिखी चिट्ठी

Jobs, AI, Farmers, and Subsidies... Bernstein Identifies India’s 8 Critical Pain Points in an Open Letter to PM Modi; Outlines the Way Forward.

दुनिया की जानी-मानी रिसर्च फर्म बर्न्स्टीन (Bernstein) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला खत लिखा है. ये सिर्फ एक ख़त नहीं है, बल्कि ये भारत की असली तस्वीर है जो एक विदेशी बड़े एनालिस्ट ने बिना लाग-लपेट के लिखी है. ये ख़त 2019 में लिखे गए उनके पिछले ख़त से आगे की कहानी कहता है. 2019 में दुनिया बिल्कुल अलग थी, कोविड नहीं था, AI की चर्चा नहीं थी, ग्लोबलाइज़ेशन ठीक-ठाक चल रहा था. मगर, अब 2026 में हालात बदल चुके हैं. चीन+1 का मौका आया, लेकिन फायदा उठाने में देरी हुई. Gen AI ने भारत के IT सेक्टर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

हालांकि बीते 6 सालों में भारत ने आर्थिक मोर्चे पर काफी तरक्की की है और सब्सिडी के बजाय ‘प्रोडक्टिव कैपिटल एक्सपेंडिचर’ पर फोकस किया है. लेकिन, बर्न्सटीन का मानना है कि आने वाले दशक की चुनौतियां पहले से कहीं ज्यादा बड़ी हैं. बर्न्सटीन का कहना है कि भारत के पास पूंजी है, प्रतिभा है और महत्वाकांक्षा है, बस ज़रूरत है तो कठिन फैसले जल्दी लेने की, नहीं तो यह मौका भी निकल जाएगा. बर्न्सटीन ने अपनी चिट्ठी में 8 मुद्दों का जिक्र किया है और उनके समाधान भी बताए हैं.

रोज़गार: सबसे बड़ी चुनौती

    भारत का सबसे बड़ा संकट रोजगार है. पिछले दो दशकों में भारत के मिडिल क्लास की तरक्की का इंजन IT और BPO जैसे सेक्टर रहे हैं. इसी की वजह से देश का मिडिल क्लास घर खरीद सका, हवाई जहाजों में बैठ सका और अपने बच्चों को स्कूल भेज सका. लेकिन अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इस मॉडल को चुनौती दे रहा है. अब Gen AI इन्हीं नौकरियों को निगल रहा है. और सबसे बड़ी चिंता ये है.

    • AI के मॉडल्स, प्लेटफॉर्म्स और IP का फायदा अमेरिका और चीन उठा रहे हैं
    • भारत सिर्फ इन टेक्नोलॉजीज का यूजर बनकर रह जाएगा, फायदा उठाने वाला नहीं
    • मैन्युफैक्चरिंग इस खाली जगह को नहीं भर पा रहा, क्योंकि प्राइवेट कैपेक्स कम है

    बर्नस्टीन अपनी रिपोर्ट में सवाल पूछता है कि अगले दशक में भारत ज़्यादा इंजीनियर्स और प्रोडक्ट बिल्ड्स बनाएगा या फिर डिलीवरी बॉय, ड्राइवर्स और डोमेस्टिक हेल्प पैदा करेगा?

    खेती: सब्सिडी नहीं बड़े रिफॉर्म की ज़रूरत

    भारत की 42-45% आबादी खेती पर निर्भर है, लेकिन GDP में इसका योगदान सिर्फ 15-16% है. यानी आधा भारत एक ऐसे सेक्टर पर जी रहा है जो देश को ज़्यादा कुछ दे नहीं पा रहा है. बर्न्सटीन का कहना है कि कर्ज माफी और इनपुट सब्सिडी जैसे कि बिजली, खाद पर छूट, इस समस्या का हल नहीं हैं. हमें सिंचाई सुविधा बढ़ाने, बेहतर लॉजिस्टिक्स और स्टोरेज में निवेश करने की जरूरत है. कृषि कानूनों को वापस लिया गया जिसने रिफॉर्म्स को मुश्किल बना दिया, लेकिन ये सुधार अब भी बहुत जरूरी हैं.

    इस साल औसत से कम बारिश की आशंका है, जिससे खेती की आय घटने और महंगाई बढ़ने का बड़ा खतरा है. साथ ही, खराब स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स की वजह से भारत आज भी अपनी कुल कृषि उपज का 5-15% हिस्सा खो देता है. बर्न्सटीन ने कृषि को लेकर जो चिंताएं जताई हैं, उसके कुछ समाधान भी दिए हैं. बर्न्सटीन की सलाह है कि सब्सिडीज को बंद करो लेकिन किसानों की इनकम सुरक्षित रखो, सिंचाई बढ़ाओ और एग्री इंफ्रा में ज्यादा निवेश करो.

    ऊर्जा सुरक्षा: तेल से बिजली की ओर

    भारत अब डेटा सेंटर्स और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग की बात करता है, लेकिन बिजली सप्लाई अब भी एक भरोसेमंद नहीं है. पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों का घाटा 5-6 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जा चुका है. ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का करीब 88% कच्चा तेल इंपोर्ट करता है, यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है. बर्न्सटीन का सुझाव है कि हमें ‘इंटरनल कम्बशन इंजन’ (ICE) यानी पेट्रोल-डीजल वाली गाड़ियों को धीर-धीरे बंद करने की एक समयसीमा तय करनी होगी. सरकार को उन अमीर कंपनियों को PLI का फायदा देने के बजाय ग्राहकों को सब्सिडी दे तो ज्यादा बेहतर होगा इलेक्ट्रिक गाड़ियां अपनाना चाहते हैं. बर्न्सटीन की चेतावनी है कि अगर अभी नहीं जागे तो भारत टेक्नोलॉजी निर्भरता में फंसकर रह जाएगा, जैसा कि क्रूड ऑयल में फंसा हुआ है.

    बर्न्सटीन ने इसके लिए कुछ जरूरी सुझाव भी दिए हैं –

    AI: केवल यूजर नहीं, ड्राइवर बनें

    ये वो मुद्दा है जो आज दिखता नहीं, लेकिन आने वाले वक्त में सबसे गहरा असर डालेगा. भारत आज डेटा सेंटर्स का हब तो बन रहा है, लेकिन हमारे पास अपना कोई बड़ा ‘फाउंडेशनल AI मॉडल नहीं है जैसे कि ChatGPT. डर ये है कि भारत का डेटा अगर ग्लोबल मॉडल्स को ट्रेन करने में लग रहा है, और बदले में हम कुछ नहीं बना रहे हैं, तो हम AI इकोनॉमी के परमानेंट कंज्यूर ही बनकर रह जाएंगे. बर्न्सटीन ने सुझाव दिया है कि चीन की तरह भारत को भी अपनी टेक इंडस्ट्री को शुरू में संरक्षण देना चाहिए.

    इसके लिए बर्नस्टीन के कुछ सुझाव ये हैं –

    मैन्युफैक्चरिंग: इरादा है, गहराई नहीं

    भारत मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में बहुत देर से उतरा है. ‘चीन+1’ की चर्चा तो बहुत है, लेकिन इसे जमीन पर उतारना मुश्किल साबित हो रहा है. बर्न्सटीन का कहना है कि हमें रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और एडवांस्ड मैटेरियल्स जैसे उभरते सेक्टर्स को पहले ही पहचान कर उनमें निवेश करना होगा, वरना हम हमेशा दुनिया के पीछे ही चलते रहेंगे. हालांकि PLI स्कीम्स से थोड़ी हलचल ज़रूर आई, लेकिन मैुन्युफैक्चरिंग अब भी GDP का सिर्फ 16-17% है और ज़्यादातर रोज़गार लो-प्रोडक्टिविटी इनफॉर्मल सेक्टर में है. EV जैसे स्ट्रैटेजिक सेक्टर में बैटरी सेल्स जो कुल लागत का 30-40% हैं, हम वो भी इंपोर्ट ही कर रहे हैं. हमारी सप्लाई चेन सुचारू नहीं है, स्किल्ड लेबर कम हैं, एग्जीक्यूशन तो काफी धीमा है

    मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए बर्नस्टीन के कुछ सुझाव ये हैं –

    ट्रांसपोर्ट: रेलवे और बुलेट ट्रेन पर फोकस

    बर्न्सटीन का कहना है कि भारत एविएशन पर ज़ोर दे रहा है, जबकि रेलवे में ज्यादा फायदा है, ये उल्टी प्राथमिकता है. हवाई यात्राएं महंगी हैं और इसके पुर्जे से लेकर ईंधन तक का इंपोर्ट करना पड़ता है, इसके बजाय, हमें हर साल कम से कम एक नया ‘बुलेट ट्रेन’ कॉरिडोर बनाने की जरूरत है. शहरों के भीतर मेट्रो और बस नेटवर्क को मजबूत करना प्राथमिकता होनी चाहिए.

    इस सेक्टर पर भी बर्न्सटीन ने सरकार को कुछ सुझाव दिए हैं

    सब्सिडी बनाम विकास

    राज्यों में महिलाओं को सीधे कैश ट्रांसफर जैसे लाड़ली बहना या अन्य योजनाएं देने का चलन बढ़ रहा है. बर्न्सटीन इसे एक महंगा सौदा मानते हैं, जो पैसा सड़कों, सिंचाई, बिजली और स्कूलों के निर्माण में लगना चाहिए, वह वोट बटोरने वाली कैश स्कीम्स में जा रहा है. इससे शॉर्ट-टर्म में तो फायदा हो सकता है, लेकिन लॉन्ग-टर्म में देश की प्रोडक्टिविटी घटती है.

    ये लोकतांत्रिक विवशता को दर्शाता है या देश की आर्थिक विफलताओं को, जहां रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की कमी के कारण टैक्सपेयर्स के पैसे का इस्तेमाल वोट बटोरने के लिए किया जा रहा है. अभी एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में महिलाओं के लिए चल रही बिना शर्त नकद योजनाओं पर सालाना करीब 1.7 से 2.5 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं, जो कि GDP का करीब 0.5% है. जैसे मध्य प्रदेश की ‘लाडली बहना’ और महाराष्ट्र और बिहार में भी ऐसी ही योजनाएं हैं. ये पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर, शहरी विकास, मानव पूंजी और रिसर्च में खर्च किया जा सकता था, अब सीधे कैश बांटने में खर्च हो रहा है.

    टैक्स और सरकारी सेवाएं: भरोसा बढ़ाने की जरूरत

    भारत में टैक्स का बोझ कम नहीं है, लेकिन सरकारी सेवाओं- स्वास्थ्य, शिक्षा की गुणवत्ता कमजोर है. बर्न्सटीन ने सुझाव दिया है कि टैक्स का आधार बढ़ाने के लिए राजनीतिक और धार्मिक संस्थाओं पर भी टैक्स लगाया जाना चाहिए. साथ ही, कैश के लेनदेन को खत्म करने के लिए 10 रुपये के अलावा बाकी सभी बड़े नोटों को अगले 5 साल में बंद करने का साहसी कदम उठाने का विचार दिया है.

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