कमर्शियल LPG सिलिंडर एक बार फिर महंगा हो गया. तेल मार्केटिंग कंपनियों ने आज 1 मई से 19 किलो वाले कमर्शियल LPG सिलिंडर की कीमत में 993 रुपये का इज़ाफा कर दिया है. हालांकि आम घरों में इस्तेमाल होने वाले 14.2 किलो के रसोई गैस सिलिंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
कमर्शियल LPG के दाम दोगुना हुए!
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) की वेबसाइट के मुताबिक राजधानी दिल्ली में अब 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत बढ़कर 3,071.5 रुपये हो गई है. इसके अलावा, 5 किलो वाले छोटे (FTL) सिलिंडर की कीमत में भी 261 रुपये की बढ़ोतरी हुई है.
कमर्शियल LPG सिलिंडर इस साल अबतक 5 बार महंगा हो चुका है. या यूं कहें कि हर महीने की पहली तारीख को कमर्शियल LPG सिलिंडर के दाम बढ़े ही हैं. साल 2026 की शुरुआत से पहले सिलिंडर 1,608.50 रुपये का मिलता था, जो कि अब बढ़कर 3,071.50 रुपये हो चुका है. यानी इन 5 महीनों में दाम करीब-करीब दोगुना बढ़ चुके हैं. जनवरी से लेकर मई तक कमर्शियल सिलिंडर के दाम 1,463 रुपये तक बढ़ चुके हैं.
अब पेट्रोल-डीजल, घरेलू LPG का नंबर!
भले ही तेल कंपनियां घरेलू गैस सिलिंड के दाम नहीं बढ़ा रही हैं, पेट्रोल-डीजल के दामों को भी इन्होंने अबतक नहीं छुआ है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि इनके दाम आगे बढ़ेंगे ही नहीं. कुछ दिन पहले कोटक सिक्योरिटीज की रिपोर्ट आई थी, जिसमें इस बात का जिक्र किया गया था कि 29 अप्रैल के बाद जब 5 राज्यों में चुनाव खत्म हो जाएंगे तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 25-28 रुपये प्रति लीटर का भारी इज़ाफा होगा. मगर, सरकार ने इससे इनकार करते हुए कहा कि ऐसे किसी भी प्रस्ताव पर विचार नहीं हो रहा है.
सरकार के इस जवाब के बाद ये मान लेना कि घरेलू सिलिंडर या फिर पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे ही नहीं, ये बात पचाना थोड़ा मुश्किल हैं. क्योंकि आंकड़े और हालात कुछ और ही कहानी बता रहे हैं. एक्सपर्ट्स भी मान रहे हैं कि ये राहत ज्यादा समय तक नहीं टिक पाएगी.
तेल कंपनियों (IOC, BPCL और HPCL) का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं. गुरुवार को क्रूड के दाम 126 डॉलर प्रति बैरल तक उछल गए थे, लेकिन घरेलू बाजार में कीमतों को लंबे समय से नहीं बढ़ाया गया है.
इसलिए अब तेल कंपनियों ने सरकार को साफ साफ संकेत दिए हैं कि बढ़ते घाटे के कारण अब पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाना मजबूरी हो गई है. OMCs पेट्रोल, डीजल, घरेलू LPG और विमान ATF की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए जोर दे रही हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और रिटेल कीमतों के बीच का अंतर बढ़ने से उनका घाटा काफी बढ़ गया है.
तेल कंपनियों पर बढ़ता घाटे का बोझ
तेल मार्केटिंग कंपनियां रिटेल पंपों पर बेचे जाने वाले डीजल के हर लीटर पर पैसा गंवा रही हैं, क्योंकि आम कंज्यूमर्स के लिए कीमतें स्थिर रखी गई हैं. भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण ग्लोबल क्रूड प्राइसेज की बढ़ती कीमतों ने इस स्थिति को और खराब कर दिया है. इसलिए भले ही आम जनता के लिए डीजल महंगा नहीं हुआ है, लेकिन ‘बल्क’ में डीजल खरीदने वाले औद्योगिक ग्राहकों के लिए कीमतों में इजाफा कर दिया गया है. दिल्ली में, बल्क डीजल की कीमत लगभग 134.5 रुपये प्रति लीटर है, जबकि रिटेल में ये 87.6 रुपये है, यानी करीब 47 रुपये प्रति लीटर का अंतर.
IOC, HPCL और BPCL जैसी सरकारी तेल कंपनियां, जिनके शेयरों की कीमतें आमतौर पर उनके कमोडिटी बिजनेस को दर्शाती हैं, अब घटते मुनाफे का सामना कर रही हैं जो निवेशकों के लिए चिंता का सबब हो सकता है. मुनाफे से जुड़ी इन्हीं चिंताओं के कारण हाल ही में इन तेल कंपनियों के शेयरों का प्रदर्शन भी थोड़ा डगमगाया हुआ रहा है.
तेल कंपनियां इस वक्त अंडर रिकवरी के गज़ब दबाव में हैं, और ये दबाव लगातार बढ़ते रहने का ही अनुमान है, अगर जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो- इस दबाव को कुछ प्वाइंटर्स में समझने की कोशिश करते है.
अंडर रिकवरी का अनुमान: अगर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें इसी स्तर पर बनी रहीं, तो FY2026-27 में तेल मार्केटिंग कंपिनयों की कुल अंडर-रिकवरी यानी कि घाटा 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.
पेट्रोल-डीजल-LPG पर घाटा
तेल मार्केटिंग कंपनियों का पेट्रोल, डीज़ल और LPG पर घाटा लगातार बढ़ रहा है. इसकी बहुत बड़ी वजह है ब्रेंट क्रूड का $115-$120 प्रति बैरल के आसपास बने रहना. क्रूड का इतने ऊंचे भाव पर रहने के बावजूद भारत में पिछले लगभग 4 सालों से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ग्लोबल कीमतों के रेश्यो में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं की गई. ICRA की एक रिपोर्ट कहती है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बावजूद पेट्रोल-डीजल के दामों में बदलाव न होने से तेल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के मुनाफे पर बुरा असर पड़ रहा है.
डीजल: अगर कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल रहती हैं तो, कंपनियों को 35 रुपये प्रति लीटर तक का घाटा होने का अनुमान है
पेट्रोल: जब कच्चे तेल की कीमत 120-125 डॉलर प्रति बैरल के आसपास होती है, तब पेट्रोल पर करीब 18 रुपये प्रति लीटर का नुकसान होने का अनुमान है.
घरेलू LPG (14.2 kg): मार्च 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, घरेलू सिलेंडर पर अंडर-रिकवरी लगभग 290 रुपये प्रति सिलेंडर तक पहुंच गई है.
घाटे की डरावनी तस्वीर
तेल मार्केटिंग कंपनियों पर कितना दबाव है वो इसी बात से समझ लीजिए कि कंपनियां हर रोज करोड़ों रुपये का घाटा उठा रही हैं. पेट्रोल-डीजल के अलावा तेल कंपनियों पर LPG से होने वाले घाटे का भी भारी दबाव है. मार्च 2026 तक केवल घरेलू LPG की बिक्री पर OMCs का घाटा 31,000 करोड़ रुपये को पार कर गया है. फरवरी 2026 तक LPG अंडर रिकवरी 53,700 करोड़ तक पहुंच चुकी थी, जबकि सरकार ने केवल ₹30,000 करोड़ का मुआवज़ा देने की घोषणा की थी.
दैनिक घाटा: अप्रैल की एक रिपोर्ट बताती है कि जब कच्चा तेल अपने चरम पर था, तब ये तेल मार्केटिंग कंपनियां रोज़ाना 2,400 करोड़ रुपये का घाटा उठा रही थीं, जो एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बाद बाद घटकर करीब 1,600 करोड़ रुपये प्रतिदिन पर आया है. दरअसल, 26 मार्च 2026 को सरकार ने पेट्रोल पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी 13 रुपये से घटाकर 3 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर शून्य कर दी, जिससे OMCs को कुछ राहत मिली. इसके बाद नुकसान घटकर 1,600 करोड़ प्रति दिन रह गया.
मंथली घाटा: Emkay की रिपोर्ट के मुताबिक OMCs की ऑटो फ्यूल अंडर रिकवरी 20–27 रुपये प्रति लीटर है, जिसका मतलब है कम से कम 25,000 करोड़ रुपये हर महीने का नुकसान. LPG अंडर रिकवरी अलग से 8,000–8,500 करोड़ रुपये प्रति महीना और कुल मासिक नुकसान 35,000 करोड़ रुपये है, जो क्रूड के उथल-पुथल होने पर 50,000 करोड़ रुपये महीना तक जा सकता है.
आखिर कब तक?
कुल मिलाकर, आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि तेल मार्केटिंग कंपनियां इस वक्त एक ऐसे दोराहे पर खड़ी हैं, जहां एक तरफ बढ़ता घाटा है और दूसरी तरफ आम जनता को महंगाई से बचाने का दबाव. हर रोज करोड़ों रुपये का बोझ सहना किसी भी कंपनी के लिए लंबे समय तक मुमकिन नहीं है. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $120 के पार इसी तरह टिकी रहती हैं, तो कंपनियों की बैलेंस शीट पूरी तरह डगमगा सकती है.
इतिहास गवाह है कि बाजार के नियम और घाटे का गणित आखिर में कीमतों पर हावी हो ही जाता है. भले ही अभी पेट्रोल-डीजल और घरेलू गैस की कीमतें स्थिर दिख रही हों, लेकिन पर्दे के पीछे कंपनियों की बढ़ती बेचैनी और अंडर-रिकवरी के डरावने आंकड़े यह साफ इशारा कर रहे हैं कि यह राहत ज्यादा समय तक नहीं टिक पाएगी. सवाल अब यह नहीं है कि ‘क्या’ दाम बढ़ेंगे, बल्कि सवाल ये है कि सरकार और कंपनियां इस बोझ को ‘कब तक’ और ‘कैसे’ रोक पाती हैं. आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल और LPG की कीमतों में बढ़ोतरी से इनकार करना अब नामुमकिन सा लग रहा है.














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